शनिवार, 27 अगस्त 2016

= परिचय का अंग =(२८/३०)

॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥
**श्री दादू अनुभव वाणी** टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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**= परिचय का अँग ४ =**
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दादू बिन रसना जहं बोलिये, तहं अंतरयामी आप ।
बिन श्रवणहुं सांई सुने, जे कुछ कीजे जाप ॥२८॥
जिस अनाहत चक्र में जिव्हा - मूलादि स्थान और वायु के आघात बिना सँकल्प रूप से बोला जाता है, वहां ही स्वयँ परमात्मा अन्तर्यामी रूप से स्थित है और साधक जन जो भी कुछ जापादि साधन करते हैं, उन सब को भगवान् श्रवणादि इन्द्रियों के बिना भी सुनता देखता रहता है ।
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*परिचय जिज्ञासु उपदेश*
ज्ञान लहर जहां तैं उठे, वाणी का परकास ।
अनुभव जहं तैं ऊपजे, शब्दैं किया निवास ॥२९॥
२९ - ३७ में साक्षात्कार के इच्छुक जिज्ञासु को उपदेश कर रहे हैं - जहां से ज्ञान की लहर उठकर वाणी का सूक्ष्म रूप प्रकट होता है, आत्मानुभव उद्भव होता है और जहां पर प्रणव रूप शब्द ब्रह्म का निवास है ॥२९॥ 
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सो घर सदा विचार का, तहां निरंजन वास ।
तहं तू दादू खोज ले, ब्रह्म जीव के पास ॥३०॥
वही हृदय निरँतर ब्रह्म - विचार का स्थान है, वहां ही माया – रहित परब्रह्म का विशेष रूप से निवास है । हे जिज्ञासु ! वहां पर ही निदिध्यासन द्वारा खोज करके तू ब्रह्म को प्राप्त कर ले, ब्रह्म जीव के पास ही है । अन्वेषण करने पर तुझे जीव ब्रह्म का अभेद रूप से ही साक्षात्कार होगा ॥३०॥
(क्रमशः)

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