शनिवार, 27 अगस्त 2016

= विन्दु (२)८३ =

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॥ दादूराम सत्यराम ॥
**श्री दादू चरितामृत(भाग-२)** लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥

**= विन्दु ८३ =**

**= ईड्वे पधारना =** 
फिर दूजनजी के आग्रह से ईडवा पधारे । ईडवा में आठ मास पहले रह कर गये थे । अब की बार भी चार मास ईडवा में विराजे । इस प्रकार एक वर्ष का ईडवा में निवास चरित्रकारों ने लिखा है । इन्हीं दिनों में बीकानेर नरेश रायसिंह खाटू ग्राम में आये थे, कारण वि. सं. १६५७ में बादशाह ने माधोसिंह को हटाकर नागौर आदि परगने रायसिंह को जागीर में दिये थे । उनकी व्यवस्था के लिये खाटू आये थे । उन्होंने सुना कि भीमसिंहजी(बड़े सुन्दरदासजी) मेरे काका साहब के गुरुदेव आजकल ईडवा में विराज रहे हैं । अतः भुरटिया राव रायसिंह को भी दादूजी के दर्शन करने की इच्छा हुई तब उन्होंने खाटू ग्राम में ही दादूजी को बुलाने का विचार किया । 

**= दादूजी को खाटू बुलाने का पत्र =** 
फिर बीकानेर नरेश भुरटिये राव रायसिंह ने दादूजी के दर्शन और सत्संग की इच्छा से उन्हें खाटू ग्राम में बुलाने के लिये एक पत्र लिख कर पत्रवाहक के द्वारा ईडवा में दादूजी के पास भेजा और पत्रवाहक को मुख से भी कहा कि - तुम दादूजी को अवश्य ही लेकर आना और पत्रवाहक को संतों को लेकर आये तब कुछ आवश्यकता पड़े तो उस के लिये अर्थ भी अर्थात् मार्ग व्यव भी दे दिया गया । फिर ईडवा पहुँचकर पत्रवाहक ने दादूजी को प्रणाम कर के पत्र दादूजी के हाथ में दे दिया और कहा - आप को बीकानेर नरेश भुरटिये राव रायसिंहजी ने खाटू ग्राम में दर्शन और सत्संग के लिये बहुत आग्रह करके बुलाया है और मेरे को कहा है - तुम स्वामीजी को अपने साथ ही लेकर आना, अतः आपको मेरे साथ चलने की ही कृपा करनी चाहिये । महाराजा को आप के दर्शन की और सत्संग की तीव्र इच्छा हो रही है । इससे उनको चैन भी नहीं पड़ रहा है । आपके पधारने पर उन्हें प्रसन्नता होगी । फिर पत्र खोलकर दादूजी ने पढ़ा । उसमें आग्रह पूर्वक खाटू पधारने की ही प्रार्थना थी और लिखा था मैं आपके शिष्य भीमसिंह (बड़े सुन्दरदासजी)का भतीजा ही हूँ, मेरे पर भी आप की कृपा अवश्य होनी चाहिए । मेरी आप पर बहुत श्रद्धा है, आप मुझे दर्शन देने की कृपा अवश्य करें । शेष वार्ता तो आपके पधारने पर ही होगी । मैं आशा करता हूं कि आप मुझ सेवक की प्रार्थना स्वीकार करके अवश्य ही खाटू पधारने का अनुग्रह करैंगे ही । शेष आप की कृपा । आपका सेवक - भुरटिया रावरायसिंह, खाटू ।
बीकानेर नरेश रायसिंह का पत्र सुनकर दादूजी के शिष्य संत प्रसन्न हुये और बोले - स्वामीजी महाराज ! सुन्दरदासजी का भतीजा है और भाव से बुलाता है, इससे भुरटिया राव रायसिंह का संशय - जनित ताप हरने के लिये आप को खाटू पधारना ही चाहिये । सब शिष्यों की इच्छा देखकर दादूजी महाराज ने पत्रवाहक को खाटू चलने की स्वीकृति दे दी । फिर उसने प्रसन्नता के साथ कहा - धन्यवाद ! मेरा यहां आना सफल हो गया । फिर उसने भोजन तथा विश्राम किया । 
इति श्री दादूचरितामृत विन्दु ८३ समाप्तः । 
(क्रमशः)

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