शनिवार, 27 अगस्त 2016

= सर्वंगयोगप्रदीपिका (द्वि.उ. ४६/७) =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
https://www.facebook.com/DADUVANI
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*सर्वांगयोगप्रदीपिका (ग्रंथ२)*
*भक्तियोग नामक द्वितीय उपदेश*
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*आप निरंजन परम प्रकाशा ।*
*देखै न्यारा भया तमाशा ।* 
*तांही कछु लीपै नहिं छीपै१ ।*
*घट घट मांहिं आपु ही दीपै ॥४६॥*
(१. तुलना कीजिये-
“लिपै छिपै नहिं सब करै,गुण नहिं व्यापै कोय । 
दादू निहचल एकरस, सहजै सब कुछ होय”॥
- श्रीदादूवाणी २१-३०) 
सचाई यह है कि परमप्रकाशमय निरंजन ब्रह्म जो साक्षी रूप में अलग होकर तमाशा देख रहा है, उसी के इशारे से इस समय ब्रह्माण्ड की सृष्टि होती है । वह किसी में लिप्त नहीं होता । वह किसी के लिये नितान्त गुप्त नहीं है, अपितु प्राप्य है । वह सब का प्रतीति कराने वाला है, अर्थात् जिसके आश्रय से सब की अभिव्यक्ति है ॥४६॥
*चर्चा करौं कहां लग स्वामी ।*
*तुम सब ही के अंतरजामी ।* 
*सृष्टि कहत कछु अन्त न आवै ।*
*तेरा पार कौंन धौं पावै ॥४७॥* 
हे जगत् के नियन्ता ! हम कहाँ तक आपका गुणगान करें, आप तो स्वयं अन्तर्यामी हैं, सब के मन की जानने वाले हैं । इस सृष्टि(रचना)के विषय में हम कहाँ तक कहें, उसका कोई अन्त नहीं है; क्योंकि यह आपकी की हुई लीला है, इस लीला का कौन पार पा सकता है ! ॥४७॥ 
(क्रमशः)

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