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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*श्री रज्जबवाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
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* ५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ १७/२०*
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*ओले अंडे मोतियहुँ, घड़े सँवारे कौन ।*
*त्यों रज्जब शिष नीपजे, मन वच कर्म गुरु भौन ॥१७॥*
आकाश से वर्षने वाले ओलों को, अंडो को और सींप के मोतियों को कौन घड़कर सुधारता है ? वे अपने आप ही समयानुसार बन जाते हैं, वैसे ही शिष्य गुरु के द्वार पर रहने से मन वचन कर्म से उपदेश धारण करते हैं तब अपने भावनानुसार आप ही श्रेष्ठ बन जाते हैं ।
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*रज्जब सद्गुरु स्वाति गति, बैन बूंद निज वारि ।*
*मन मुक्ता निपजे तहाँ, नर निरखो सु निहार ॥१८॥*
सद्गुरु स्वाति नक्षत्र के समान हैं, उनके अपने वचन ही बिन्दु के समान हैं, देखो स्वाति बिन्दु सींप में पड़ती है तब ही मोती उत्पन्न होता है, वैसे ही ध्यानपूर्वक देखो, श्रवणों द्वारा गुरु वचन शिष्य के मन में जाते हैं तब ही ज्ञान उत्पन्न होता है ।
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*सद्गुरु चम्बुक रूप हैं, शिष सूई संसार ।*
*अचल चले उनके मिल्यूं, ता में फेर न सार ॥१९॥*
संसार में सद्गुरु चम्बुक के समान है, और शिष्य सूई के समान हैं । जैसे चम्बुक के द्वारा अचल सूई में गति होती है, वैसे ही सांसारिक भावना से ऊपर उठना रूप गति जिसमें नहीं होती, उस शिष्य में सद्गुरु के संग से परब्रह्म की ओर गति होने लगती है । यह कथन सार रूप है, इसमें परिवर्तन नहीं हो सकता ।
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*पावक रूपी परम गुरु, लाखमयी सब लोय१ ।*
*रज्जब दर्शन तिन हुँ के, कठिन से कोमल होय ॥२०॥*
सद्गुरु अग्नि रूप है, अन्य सब लोक१ लाख रूप हैं । जैसे अग्नि की समीपता से कठिन लाख कोमल हो जाती है, वैसे ही सद्गुरु के संग से सब प्राणियों का कठोर हृदय भी कोमल हो जाता है ।
(क्रमशः)

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