🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
.
*दादू तज भरतार को, पर पुरुषा रत होइ ।*
*ऐसी सेवा सब करैं, राम न जाने सोइ ॥*
==============
*साषी लापचारी की ॥ पतिव्रता-व्यभिचारणी ॥*
जल पोसौं का आभरण, पहरि किया टुक कोड ।
बषनां बांदी क्यूँ करै, पतिबरता की होड ॥
रांडाँ मिलि मंगल कियौ, मुणिस नहीं घर माँहिं ।
करि सिंगार हसती फिरै, रूली बिगूचै काँहिं ॥१
(१.इनका अर्थ ‘भेष को अंग’ की साषी १ व ३ में देखें ।)
..
आसरड़ी मुख देखि, भेष बणायौ रे ।
कामणि कियौ सिंगार, पीव नहिं भायौ रे ॥टेक॥
पति को बरत निवाहि, निकटि बिराजै रे ।
दुराचारणि थैं दूरि, अलगौ भाजै रे ॥
पतिबरता कै देखि, बदनि उजालौ रे ।
दुराचारणी देखि, मुहड़ौ कालौ रे ॥
लोगाँ माँहिं सुहागणि, कहती डोलै रे ।
कंत न बूझै बात, फीकी बोलै रे ॥
सखियाँ माँहिं सुहाग, महल मैं हूँथी रे ।
मेल्ही माथै मारि, आँजी गूँथी रे ॥
तीरथ बरत अनेक, त्याँह सँगि रलसी रे ।
सत मुणसी ले काठ, कौंण सँगि बलसी रे ॥
पतिबरता कौ बरत, जिहि धन धार्यौ रे ।
बषनां त्याँह की सेज, राम पधार्यौ रे ॥५६॥
.
“एकइ धर्म एक व्रत नेमा । कायँ बचन मन पति पद प्रेमा ॥
उत्तम के अस बस मन माहीं । सपनेहुँ आन पुरुष जग नाहीं ॥
मध्यम परपति देखइ कैसे । भ्राता पिता पुत्र निज जैसे ।
धर्म बिचारि समुझि कुल रहई । सो निकृष्ट त्रिय श्रुति अस कहई ॥
बिनु अवसर भय तें रह जोई । जानेहु अधम नारि जग सोई ।
पति बंचक परपति रति करई । रौरव नरक कलप सत परई ॥
छन सुख लागि जनम सत कोटी । दुख न समुझ तेहि सम मो खोटी ॥”
मानस ३/५/५-९ ॥
==
बषनांजी ने जिन विचारों को इस पद में व्यक्त किया है, उनका समर्थन मानस की उक्त पंक्तियाँ बहुत ही उत्तम रीति से करती हैं । वस्तुतः पतिव्रता वह है जो निज इष्ट को ही अपना सर्वस्व समझकर उसी की मन, वचन एव कर्म से भक्ति करता है । इसके विपरीत जो जग दिखावे के लिये नाना वेश बनाकर अनेक देवी-देवों की उपासना करता है, वह व्यभिचारी है ।
.
दर्पण में मुख निहार कर व्यभिचारणी कामिनी भेष = अलंकृत कपड़े पहनती तथा अन्यान्य श्रृंगार करती है किन्तु मन में पति के प्रति अनन्य अनुराग नहीं रखती है । पति अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हुए रहता तो व्यभिचारणी के साथ घर में ही है (परमात्मा रूपी पति संसारियों के मायासक्त हो जाने पर भी संसारियों पर अकारण दया-कृपा करते हुए उनकी सार-संभार करता है) किन्तु पति, ऐसी व्यभिचारणी पत्नी से अलग रहता हुआ दूर-दूर ही भागता है अर्थात् ऐसी पत्नी से न स्नेह करता है और न संसर्ग ही करता है “ये यथा मां प्रपद्यंते तांस्तथैव भजाम्यहं ।”
.
इसके विपरीत जो पतिव्रता पत्नी होती है उसका मुख पातिव्रतधर्म के तेज से आलोकित रहता है जबकि व्यभिचारणी का मुख काला = तेजहीन रहता है । (तेज युक्त = समाज में आदर, श्रद्धा, सम्मान का प्रतीक जबकि तेजहीन = तिरस्कार, अश्रद्धा का प्रतीक) व्यभिचारणी स्त्री अपने आपको समाज में सौभाग्यवती स्त्री के नाम से प्रचारित करती है (सौभाग्यवती = सपतिका, पति-प्रिया) किन्तु पति उससे संसर्ग तो क्या बात तक नहीं करता है जिसके कारण ऐसी व्यभिचारणी पति से फीकी = उल्टी-सुल्टी बोलती है, लड़ाई-झगड़ा करती है ।
.
व्यभिचारणी स्त्री अपनी सखियों में सौभाग्यवती स्त्री के रूप में जानी जाती है क्योंकि वह पति के ही महल = मकान में निवास करती है, हूँथी = सोती है । वह सौभाग्यवती स्त्रियों की भाँति आँजी = चोटी गूँथती है तथा माथे में मांग भरती है । (सिंदूर लगाती है) तीर्थ-व्रत रूपी अनेक पुरुषों के संग रलसी-रति प्रसंग करती है ।
.
ऐसी सतमुणसी = सौ पुरुषों की स्त्री अनेक पुरुषों से प्रसंग करने वाली व्यभिचारणी स्त्री, बताइये कितने पुरुषों के साथ अथवा किस पुरुष के साथ जल कर अपने सतीत्व को सिद्ध कर सकती है ! जिन स्त्रियों ने पातिव्रत धर्म रूपी धन को अपने जीवन में धारण किया है उन्हीं की सेज रूपी हृदय में परमात्मा का निवास होता है, परमात्मा का प्राकट्य होता है ॥५६॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें