गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026

किशनगढ पधारना ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१६ आचार्य दयारामजी ~ 
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किशनगढ पधारना ~  
वि. सं. १९६० में आचार्य दयारामजी महाराज किशनगढ पधारे और अपनी मर्यादा के अनुसार अपने आने की सूचना किशनगढ नरेश को दी । तब किशनगढ नरेश ने अपनी कुल परंपरा के अनुसार आचार्यजी की अगवानी का प्रबन्ध कर दिया । 
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राजाज्ञा से बाबू श्यामसुन्दरलालजी आदि मुसाहिब राजकीय पूरे लवाजमे के साथ आचार्य दयारामजी की अगवानी करने आये और मर्यादापूर्वक  बडे ठाट बाट से ले जाकर घेवर बाग में ठहराया । फिर एक दिन आचार्य दयारामजी महाराज को किशनगढ नरेश ने राज महलों में पधारने का निमंत्रण दिया ।
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आचार्यजी ने स्वीकार कर लिया, तब राजा ने अपने मंत्री को कहा- आचार्य दयारामजी महाराज को राजकीय पूरा लवाजमा और सवारी ले जाकर राजमहल में लाओ । मंत्री ने वैसा ही किया । फिर आचार्यजी को सवारी पर विराजमान कराके किशनगढ नरेश में पहुँचा दिया । दिवान खाने में चौके पर विराजमान करके किशनगढ नरेश ने आचार्यजी के भेंट चढाकर प्रणाम की और अति श्रद्धा भक्ति से हाथ जोडकर आचार्यजी के सामने बैठ गये । 
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नम्र भाव से उपदेश श्रवण किया और शिष्य संत मंडल के सहित आचार्यजी को भोजन कराकर मर्यादापूर्वक घेवर बाग पहुँचा दिया । आचार्यजी कुछ दिन किशनगढ की धार्मिक जनता को उपदेश करते रहे । जनता ने भी आचार्यजी की श्रद्धा भक्ति से सेवा की । फिर किशनगढ से विदा होकर भ्रमण करते हुये नारायणा दादूधाम में पधार गये ।  
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दहलोद चातुर्मास ~ 
वि. सं. १९६१ में आचार्य दयारामजी महाराज को चातुर्मास का निमंत्रण भगवानदासजी दहलोद वालों ने दिया । आचार्यजी ने स्वीकार कर लिया । चातुर्मास का समय समीप आने पर अपने शिष्य संत मंडल के साथ आचार्य दयारामजी महाराज दहलोद पधारे । भगवान्दासजी मर्यादा पूर्वक आचार्यजी की अगवानी करके आचार्यजी को स्थान पर लाये । चातुर्मास मर्यादापूर्वक  आनन्द के साथ समाप्त हो जाने पर आचार्यजी को मर्यादानुसार भेंट तथा संतों को वस्त्र देकर सस्नेह विदा किया  ।
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बीकानेर का चातुर्मास ~ 
वि. सं. १९६२ में महन्त सूरतरामजी बीकानेर वालों ने आचार्य दयारामजी महाराज को चातुर्मास का निमंत्रण दिया । आचार्यजी ने स्वीकार किया और समय पर अपने शिष्य संत मंडल के सहित भ्रमण करते हुये बीकानेर पहुँचे । महन्त सूरतरामजी ने बडे ठाट बाट से आचार्यजी की अगवानी की और स्थान पर ले गये । चातुर्मास आरंभ हो गया । 
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चातुर्मास के कार्यक्रम ठीक समय पर होने लगे । बीकानेर की श्रद्धालु भक्त जनता सत्संग में आकर अति प्रेम से दादूवाणी का प्रवचन सुनती थी । नगर के सेठ रसोइंया देते थे । शिष्य संत मंडल के सहित आचार्यजी को अपने घरों पर मर्यादापूर्वक पूर्ण सम्मान से ले जाकर भोेजन कराते थे । भेंट देते थे और सम्मान से आसन पर पहुँचा देते थे । चातुर्मास समाप्ति पर महन्त सूरतरामजी ने आचार्यजी को उनकी मर्यादानुसार भेंट तथा शिष्य संत मंडल को यथायोग्य वस्त्रादि देकर सस्नेह विदा किया था ।
(क्रमशः)

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