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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*सूरज कोटि प्रकास है,*
*रोम रोम की लार ।*
*दादू ज्योति जगदीश की,*
*अंत न आवै पार ॥*
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*साँच ॥*
धीरौ रे धीरौ मन, अहींठै सै जोइलौ ।
काया माँहैं गुर बतायौ, तिहीं ठाहर होइलौ ॥टेक॥
ग्यान के उजालै देखि, दीपक बालि के ।
बाहिरै क्याँहनैं ढूंढै, घर ही मैं न्हालि रे ॥
जहाँ आसण तहाँ बासण, रह्यौ भरपूरि रे ।
गुर गम बाहिरौ, नेड़ा ही तैं दूरि रे ॥
अहूँ कै पैलै कानैं, धरती कै छेव रे ।
वैलै कानैं गुण गली, पैलै कानैं देव रे ॥
जहाँ जीव तहाँ सीव, ऐकणि बासि रे ।
ब्रह्म बतायौ गुरि, सास कै पासि रे ॥
पाणी पाखै कवल फूल्यौ, चाँद कै परगासि रे ।
दसवैं दवारि देखी, हरि की रहासि रे ॥
लिपै नाहीं छिपै नांहीं, सब थैं न्यारौ रे ।
घटि घटि रमि रह्यौ, सो राम हमारौ रे ॥
जे बाहरि सोइ भीतरि, निहचै करि जाणि रे ।
बषनां बिनाणी बाबौ, लै नैं पिछाणि रे ॥५५॥
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“बधुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः ।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥१६/६ गीता॥
मन को धीरौ = स्थिर कर; मन को निश्चल कर । निश्चल मन में ही परमात्मा को देखा जा सकता है । (हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति) परमात्मा इस शरीर में ही निवास करता है, तीर्थ, मन्दिरादि में नहीं और गुरुमहाराज ने भी काया में ही परमात्मा का निवास बताया है ।
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विवेक रूपी दीपक को जला = जागृत करके = ज्ञान = ब्रह्मात्म्यैक्यात्मक ज्ञान के प्रकाश में उस परमात्मा को देख = जान । उस परमात्मा को बाहर क्यों ढूंढ़ता है, उसे तो घर में ही = घट में ही देख । परमात्मा देश अथवा काल अथवा परिस्थिति के परिच्छेदों से हीन है । अतः उसे ढूंढ़ने इधर-उधर न जाना चाहिये ।
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जहाँ हमारा निवास है, परमात्मा वहीँ वास करता है क्योंकि वह जर्रे-जर्रे में परिव्याप्त है “हरि व्यापक सर्वत्र समाना । प्रेम तैं प्रगट होइ मैं जाना ॥” हाँ, जो लोग गुरु के ज्ञान को ग्रहण नहीं करते उनके लिये परमात्मा अत्यन्त निकट होते हुए भी दूर से दूर है । जिनमें अहंकार की मात्रा अत्यधिक है (एक किनारे से दूसरे किनारे तक अर्थात् प्रारम्भिक बिन्दु से अन्तिम बिन्दु तक) उनके लिये परमात्मा उतनी ही दूर है जितना पृथिवी का दूसरा छोर (पृथिवी गोल है, अतः उसका दूसरा छोर ही नहीं । इसी प्रकार जिनमें अहंकार का प्राबल्य है उनके लिये परमात्मा की प्राप्ति असंभव है । “क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्त चेतसाम् ।
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥ गीता १२/५)
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संसार का पहला कौना त्रिगुणों की सँकरी गली है जिसमें चलने पर जीव उसी में फँस मरता है जबकि दूसरा किनारा राजमार्ग है जिसपर चलने पर देव = परमात्मा की प्राप्ति होती है । जहाँ पर जीव है, वही पर सीव = ब्रह्म है । दोनों एक हैं और एक होने से ब्रह्म ही शरीर में निवास करता है । (जीव और ब्रह्म की एकता चैतन्य के आधार पर है, शरीर के आधार पर नहीं)
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गुरुमहाराज ने ब्रह्म का स्थान श्वास के पास बताया है । (यहाँ श्वास के पास ही में ब्रह्म है, से हठयोग विवक्षित प्राणादि शोधन न होकर श्वास-प्रतिश्वास रामनाम स्मरण है) रामनाम साधना से बिना पानी के ही चंद्रमा के प्रकाश से कमल खिल उठता है । (व्यवहार में सूर्य के प्रकाश में ही जल में कमल खिलता है) हरि का निवासस्थान दसवें द्वारि = ब्रह्मरंध्र में है । वहीं उस हरि को निवास करते हुए दसवें द्वार = ब्रह्मरंध्र में देखा ।
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वह किसी से छिपता नहीं है अर्थात् स्वयं प्रकाशवान है । संसार के जर्रे जरे में परिव्याप्त होते हुए भी निष्काम होने से अलिप्त है “मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्त मूर्तीना । मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः । गीता ९॥४॥ वह परमात्मा सब में होते हुए भी सब से पृथक है । वह राम घट-घट = शरीर-शरीर में व्याप्त है ।
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ऐसा राम ही मेरा इष्ट राम हैं । जो बाहर है, वही भीतर है इसे निश्चित रूप से जान ले । बषनां कहता है अलख, अगोचर परमात्मा को जान ले, प्राप्त कर ले । “सीय राम मय सब जग जानी” मानस ॥५५॥
(क्रमशः)

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