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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२०. विपर्यय कौ अंग ५/८
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समद समानौं बून्द मैं, राइ मांहे मेर ।
सुन्दर यह उलटी भई, सूरज कियौ अन्धेर ॥५॥
नाम-साधना द्वारा साधक का अतिसुक्ष्म जीवात्मा (बूंद) महान् अप्रमेय ब्रह्म (समुद्र) में समा गया । अर्थात् एवं ब्रह्म की एकता हो गयी । इसी प्रकार, अतिसूक्ष्म ब्रह्माकार वृत्ति रूप राई में अतिशय विशाल मिथ्या जगद्रूप सुमेरु पर्वत समा गया । अर्थात् ब्रह्माकार वृत्ति होते ही जगत् का लय हो गया ।
इसी प्रकार, साधक के हृदय में ब्रह्मज्ञान रूप प्रकाशमय सूर्य के उदित होते ही अज्ञानरूप जगत् के अभाव का अन्धकार छा गया । अर्थात् इस ज्ञानसूर्य ने उथल पुथल किया कि उसके उदय के साथ ही अब तक भासमान संसार का नाश (निवृत्ति) हो गया । (द्र० सवैया : २२/छ० सं० ४) ॥५॥
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मछली बुगला कौं ग्रस्यौ, देखहु याके भाग ।
सुन्दर यह उलटी भई, मूसै खायौ काग ॥६॥
विवेक बुद्धि रूप मछली ने दम्भ (वृथाभिमान) रूप बगुला को अपना भक्ष्य बना लिया । अर्थात् शुद्ध मन हो जाने से, जिज्ञासु की जगद्भ्रान्ति मिट गयी । यह उसका सौभाग्य ही है ।
साथ ही, यह भी उलटी रीति हो गयी कि सदा चंचल चपल मन रूप मूषक (चूहा) ने अपनी सब दुर्वासना रूप काक (कौआ) का भक्षण कर लिया । अर्थात् मन की सर्वविध चंचलता मिट जाने से जिज्ञासु की सभी दुर्वासनाएँ निवृत्त हो गयीं ॥६॥ ((द्र० सवैया : २२/छ० सं० ५ पूर्वार्ध) ।
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सुन्दर उलटी बात है, समुझै चतुर सुजांन ।
सूवै काढे पकरि कै, या मिनिकी के प्रांन ॥७॥
साधक की साधना से यह भी लोकव्यवहार के विपरीत ही घटना हो गयी कि उसके सुवासनायुक्त चित्त रूप तोते ने दुर्वासना (तृष्णा) रूप बिल्ली को मार दिया । अर्थात् अन्तःकरण शुद्ध होने से उस साधक की सभी तृष्णाएँ (लौकिक कामनाएँ) विनष्ट हो गयीं तथा उसको ब्रह्मानन्द का सहज अनुभव होने लगा । इस बात को कोई चतुर (साधनाकुशल) ज्ञानी ही समझ सकता है ॥७॥ ((द्र० सवैया : २२/छ० सं० ५)
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गुरु शिष के पायनि पर्यौ, राजा हूवौ रंक ।
पुत्र बांझ के पंगुला, सुंदर मारी लङ्क ॥८॥
वहाँ हुई एक अन्य घटना का श्रीसुन्दरदासजी सङ्केत कर रहे हैं - अब तक अज्ञानावस्था में निमग्न उस साधक का चित्त गुरुपदेश से प्राप्त ज्ञान बल के प्रभाव से उस को सत् शिक्षा देने लगा । अर्थात् सन्मार्ग की ओर प्रवृत्त करने लगा । इसका परिणाम यह हुआ कि राजा प्रजा (रंक) के रूप में परिणत हो गया । अर्थात् ज्ञान प्राप्त होने से जीवात्मा (रंक) पुनः मन (राजा) पर शासन करने लगा ।
साथ ही, एक बात यह भी हुई कि सात्विक बुद्धि रूप बांझ (बन्ध्या) नारी से उत्पन्न ज्ञान रूप पंगुल (लंगड़ा) पुत्र उत्पन्न हुआ, उसने ऊंचे प्राकार (परकोटे) से सुरक्षित लङ्का रूप इस माया मोह से सुरक्षित संसार को जीत लिया । अर्थात् निर्मल बुद्धि के कारण उत्पन्न हुए ज्ञान से साधक का समस्त भ्रमात्मक जगत् नष्ट हो गया ॥८॥ (द्र० सवैया : २२/छ० सं० ६) ॥
(क्रमशः)

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