शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026

२०. विपर्यय कौ अंग ९/१२

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२०. विपर्यय कौ अंग ९/१२
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कमल मांहिं पांणी भयौ, पाणी मांहे भांन ।
भांन मांहि ससि मिलि गयौ, सुंदर उलटौ ज्ञांन ॥९॥
मन या हृदय रूप कमल से भगवद्भक्ति रूप जल प्रकट हुआ । उस प्रेमा भक्ति रूप जल से ब्रह्मज्ञान रूप सूर्य प्रकट हुआ । उस सूर्य से त्रिविध ताप का नाश होकर स्थायी शान्तिरूप शीतल चन्द्र उत्पन्न हुआ । उस शीतल शान्ति से साधक को पूर्ण ब्रह्मानन्द का अनुभव हुआ । अर्थात् मन के शुद्ध होने से उत्पन्न प्रेमाभक्ति द्वारा ज्ञान के प्रकट होने पर सांसारिक त्रिविध ताप निवृत्त हो गया । उसके फलस्वरूप साधक को ब्रह्मसाक्षात्कार का अक्षय सुख अनुभूत होने लगा ॥९॥ (द्र० सवैया : २२/छ० सं० ७) ॥
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धोबी कौं उज्जल कियौ, कपरै बपुरौ धोइ ।
दरजी कौं सीयौ सुई, सुन्दर अचिरज होइ ॥१०॥
साधक का मन रूप धोबी जब निर्मल (निर्विकार) हुआ तो उस निर्मल मन ने साधक की काया को भी निर्विकार कर दिया१ । अर्थात् ज्ञानप्राप्ति से साधक की मननशक्ति बढी तो इस मननशक्ति ने मन को निर्मल कर दिया ।
(१ तु.- श्रीदादूवाणी - मन निर्मल तन निर्मल भाई, आन उपाइ विकार न जाई । (२८वाँ शब्द)
इसी प्रकार, सुरति रूप सूक्ष्म स्थान में भी प्रवेश करने वाली सूई ने जीव रूपी दर्जी को (ब्रह्म के साथ) सी दिया । (उस के साथ ब्रह्म की एकता कर दी ।) इस छोटी सी सूई ने इतना बड़ा काम किया ! ॥१०॥ (द्र० सवैया : २२/छ० सं० ९) ।
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सोनै पकरि सुनार कौं, काढ्यौ ताइ कलङ्क ।
लकरी छील्यौ बाढई, सुन्दर निकसी बंक ॥११॥
यह कैसा आश्चर्य हुआ कि उलटे स्मरण रूप सुवर्ण ने ही मन रूपी सुनार को तपश्चर्या आदि साधनों से तपा कर निष्कलङ्क कर दिया ।
इसी प्रकार, लय समाधि रूप लकड़ी ने बढई (खाती) को छील कर (निर्विकार = निर्दोष) उस का बांका टेढ़ापन (मद) निकाल दिया । अर्थात् प्रभुस्मरण में मग्न कर साधक का कर्मों से संसर्ग मिटा दिया । (ज्ञान द्वारा कर्मों की निवृत्ति से उस की जन्ममरण की परम्परा समाप्त हो गयी ॥११॥) (द्र० सवैया : २२/छ० सं० ९) ॥
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जा घर मैं बहु सुख किये, ता घर लागी आगि ।
सुन्दर मीठौ ना रुचै, लौंन लियौ सब त्यागि ॥१२॥
साधक ने, अज्ञानावस्था में जिस घर (काया) में विविध सुखों का भोग किया था, वही घर अब ज्ञानाग्नि से दग्ध हो (जल) गया । अर्थात् अब देहाभिमान तथा वासनाओं की निवृत्ति हो गयी । अब साधक को मीठा या नमकीन (विषयभोग) रुचिकर नहीं लगते; अतः उन सब का सर्वथा त्याग कर उसने स्वयं को भगवद्भजन में ही एकान्ततः लगा लिया है ॥१२॥ (द्र० सवैया : २२/छ० सं० १०) ॥
(क्रमशः)

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