शनिवार, 23 मई 2026

*२५. अवस्था कौ अंग ४१/४४*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*२५. अवस्था कौ अंग ४१/४४*
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ऋषभदेव बोले नहीं, रहे ब्रह्ममय होइ । 
गरक भये निज ज्ञान मैं, द्वैत भाव नहिं कोइ ॥४१॥
तृतीय(वरिष्ठ) प्रकार के सिद्धों में ऋषभदेव जी की गणना हो सकती है, जो जीवनपर्यन्त ब्रह्ममय होकर ही रहे । वे उस ब्रह्ममय ज्ञान में ऐसे निमग्न हुए कि उनमें द्वैत भाव का कुछ भी अंश नहीं रह गया ॥४१॥
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जाग्रदवस्था जानिये, जबहिं होइ साक्षात । 
अष्टावक्र वसिष्ट मुनि, कही सबनि सौं बात ॥४२॥
ब्रह्मसाक्षात्कार होने पर योगी की वह जाग्रत् अवस्था कहलाती है; इस अवस्था में पहुँचने पर अष्टावक्र एवं वसिष्ठ मुनि ने उस ब्रह्मज्ञान का जनसामान्य को भी उपदेश किया ॥४२॥
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स्वप्न अवस्था मांहिं है, पूछै बोलै सैंन । 
दत्तात्रय सुकदेवजी, कहे कछूइक बैंन ॥४३॥
ऐसे योगी की स्वप्नावस्था वह कहलाती है, जब वह किसी जिज्ञासु के पूछने पर ब्रह्मज्ञानविषयक संक्षिप्त वचन बोलता है या वैसा संक्षिप्त संकेत करता है । श्रीदत्तात्रेय या श्रीशुकदेव इसके श्रेष्ठ उदाहरण हैं ॥४३॥
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सुषुपति मैं कछु सुधि नहीं, ऐसी परम समाधि । 
ऋषभदेव चुप करि रहे, छूटी सकल उपाधि ॥४४॥
सुषुप्ति अवस्था में पहुँचे हुए सिद्ध को लौकिक व्यवहार की कोई सुध बुध(ज्ञान) नहीं रहती । वह सदा उच्चतम समाधि में रत रह कर निरन्तर ब्रह्मज्ञान में निमग्न रहता है । ऋषभदेव इस अवस्था के ज्वलन्त उदाहरण हैं । ब्रह्मज्ञान की तीव्रता के कारण उन के सभी लौकिक विकार क्षीण हो चुके थे ॥४४॥ (५)
(क्रमशः) 

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