🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*सो धी दाता पलक में, तिरे तिरावण जोग ।*
*दादू ऐसा परम गुरु, पाया किहीं संजोग ॥*
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*गुरमहिमा ॥*
मोहि मिलिया रामसनेही रे । मेरी जिव की जीवनि एही रे ॥टेक॥
पूरिबले पुनि पाया रे । सो भागि हमारे आया रे ॥
भगति मुकति का दाता रे । सो येक राम का राता रे ॥
उन साधन का सँग भावै रे । जन बषनौं मंगल गावै रे ॥१२९॥
“दुर्लभो मानुषो देहो क्षणभंगुरः ।
तत्रापि दुर्लभः मन्ये वैकुण्ठप्रिय दर्शनम् ॥”
भागवत स्कंध ११ ॥
महात्माओं का दर्शन मात्र भी बड़े भाग्य से मिलता है । यदि उनका सान्निध्य मिल जाये, फिर उनका मार्गदर्शन भी मिल जाये तो कहना ही क्या है ।
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बषनांजी इसी भावना को व्यक्त करते हे कहते हैं – मुझे रामजी से सच्चा स्नेह करने वाले महाराज दादूजी मिल गये हैं जो मेरे जीवन के जिवनि = सर्वस्व हैं । मैंने उन्हें पूर्वजन्म में किये किन्हीं पुण्यों के उदय हो आने के कारण पाया है । वस्तुतः वे तो जीवन्मुक्त भगवत्स्वरूप थे किन्तु हमारे भाग्य = पुण्यकर्मों के उदय होने के कारण वे इस समय इस धराधाम पर पधारे ।
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वे भक्ति और मुक्ति दोनों ही के देने वाले हैं । वे एक निर्गुण-निराकार-परात्पर-परब्रह्म-राम में ही निमग्न रहने वाले हैं । बषनां कहता है, मुझे उक्त वर्णित लक्षणों वाले संतों का संग करना ही रुचिकर व प्रिय लगता है । अतः जन = भक्त बषनां ऐसे संतों के मिलन पर मंगल गान करता है ॥१२९॥
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