*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१६. सूक्ष्म त्याग का अंग ~१/४*
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इस अंग में बता रहे हैं कि बाहर के पदार्थों का त्यागना सुगम है किन्तु अंतर विकारों का त्यागना कठिन है -
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वश१ अवश२ छूटहिं सदा, जन रज्जब रिधि३ राज ।
पै मन मनोरथ त्यागने, महा कठिन यह काज ॥१॥
स्वतंत्रता१ से वा परतंत्रता२ से राज्यादि संपति३ छूट ही जाती है, परन्तु मन के मनोरथों का त्याग रूप कार्य महान कठिन है ।
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व्याज राज सब त्याग दे, मूल मनोरथ माँहिं ।
जन रज्जब जिय जगत सौं, तब लग छूटे नाँहिं ॥२॥
मन में जो राज्य का मनोरथ है, वह तो मूल धन के समान है और बाहर का राज्य ब्याज के समान है । लेन-देन करने वाला ब्याज को तो छोड़ देता है किन्तु मूल धन नहीं छोड़ता है । वैसे ही प्राणी बाहर के राज्य को तो आक्रमणकारियों द्वारा छोड़ भागता है किन्तु राज्य का मनोरथ नहीं छूटता और जब तक प्राणी का मन जगत के मनोरथों को नहीं त्यागता तब तक मुक्त नहीं हो सकता ।
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तन सौं विषया छूट ही, पर मन सौं छूटे नाँहिं ।
रज्जब कश्मल तब लगे, गृह वैराग्य सु माँहिं ॥३॥
शरीर से तो विषयों का त्याग हो जाता है किन्तु मन से नहीं नहीं छूटते । चाहे घर में रहो वा सन्यासी बन जाओ, जब तक मन में विषयों का चिन्तन है तब तक पापादि विकार रहते ही हैं प्राणी उनसे मुक्त नहीं होता ।
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रज्जब नारी माँहिं नर घणे, नर में नारि अनन्त ।
महलाइत मन माँहिली, तजे सु साधू संत ॥४॥
नारी में मनोरथ रूप नर बहुत हैं और नर में मनोरथ रूप नारियाँ बहुत होती हैं । नारी नरों का संकल्प करना रूप और नर-नारियों का संकल्प करना रूप भीतर के महलों का त्यागते हैं वे ही श्रेष्ठ साधक और संत माने जाते हैं ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “१६. सूक्ष्म त्याग का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः)

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