परमगुरु ब्रह्मर्षि श्री दादूदयाल जी महाराज की अनुभव वाणी

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

= निष्कामी पतिव्रता का अंग =(८/१-३)


卐 सत्यराम सा 卐
**श्री दादू अनुभव वाणी** टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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**= अथ निष्कामी पतिव्रता का अँग ८ =**
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लय योग के साधक की निष्कामता और अनन्यता का परिचय देने को, निष्कामी पतिव्रता का अँग कथन में प्रवृत्त मँगल कर रहे हैं - 
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दादू नमो नमो निरंजनँ, नमस्कार गुरुदेवत: । 
वन्दनँ सर्व साधवा, प्रणामँ पारँगत: ॥१॥ 
जिनकी कृपा से साधक नाना कामना और प्रपँच परायणता रूप व्यभिचार से पार होकर परब्रह्म को प्राप्त होता है, उन निरंजन राम, सद्गुरु और सर्व सन्तों को हम अनेक बार प्रणाम करते हैं । 
एक तुम्हारे आसरे, दादू इह विश्वास । 
राम भरोसा तोर है, नहिं करणी की आस ॥२॥ 
२ में निष्काम पतिव्रत युक्त राम से विनय कर रहे हैं - राम ! आपकी दयालुता का ही मुझे भरोसा है । मेरे कर्त्तव्य कर्म की मुझे यह आशा नहीं है कि - मैं अपने कर्मों से ही आपको प्राप्त कर लूँगा; किन्तु आपके इस वचन पर - "मेरा भक्त मुझे ही प्राप्त होता है ।" मुझे पूर्ण विश्वास है । अत: एक मात्र आपके स्वरूप चिन्तन का ही आधार लेकर निष्काम भाव से आप में ही अनन्य हो रहा हूं । 
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रहणी राजस ऊपजे, करणी आपा होइ । 
सब तैं दादू निर्मला, सुमिरण लागा सोइ ॥३॥ 
३ - ४ में निष्काम भाव और अनन्यता की विशेषता बता रहे हैं - ब्रह्मचर्यादि व्रतों से मन में रजोगुण प्रधान अहँकार उत्पन्न होता है और यज्ञ दानादि करने से हृदय में कर्त्तव्यता का अभिमान होता है । अत: जो साधक निष्काम भाव से भगवत् में अनन्य रहकर भगवत् स्मरण में ही लगा रहता है, वही सबसे निर्मल माना जाता है ।
(क्रमशः)

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