परमगुरु ब्रह्मर्षि श्री दादूदयाल जी महाराज की अनुभव वाणी

सोमवार, 20 फ़रवरी 2017

= ८८ =

卐 सत्यराम सा 卐
कृत्रिम नहीं सो ब्रह्म है, घटै बधै नहिं जाइ ।
पूरण निश्चल एक रस, जगत न नाचे आइ ॥ 
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साभार ~ Girdhari Agarwal

**आध्यात्मिक शिक्षाप्रद कथाएँ**
**जडभरत और सौवीर-नरेश का संवाद**

प्राचीन काल की बात है, राजा भरत शालग्राम क्षेत्र में रहकर भगवान् वासुदेव की पूजा आदि करते हुए तपस्या कर रहे थे । उनकी एक मृग के प्रति आसक्ति हो गई थी, इसलिए अंतकाल में उसी का स्मरण करते हुए प्राण त्यागने के कारण उन्हें मृग होना पड़ा । मृगयोनि में भी वे ‘जातिस्मर’ हुए- उन्हें पूर्वजन्म की बातों का स्मरण रहा ।
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अतः उस मृगशरीर का परित्याग करके वे स्वयं ही योगबल से एक ब्राह्मण के रुप में प्रकट हुए । उन्हें अद्वैत ब्रहमा का पूर्ण बोध था । वे साक्षात् ब्रह्मास्वरुप थे, तो भी लोक में जडवत्(ज्ञानशून्य मूक की भाँति) व्यवहार करते थे । उन्हें हष्ट-पुष्ट देखकर सौवीर-नरेश के सेवक ने बेगार में लगाने के योग्य समझा और राजा की पालकी ढोने में नियुक्त कर दिया । सेवक के कहने से वे सौवीर-राजकी पालकी ढोने लगे । यधपि वे ज्ञानी थे, तथापि बेगार में पकड़े जाने पर अपने प्रारब्ध भोग का क्षय करने के लिए राजा का भार वहन करने लगे, परंतु उनकी गति मंद थी । वे पालकी में पीछे की ओर लगे थे तथा उनके सिवा दूसरे जितने कहार थे, वे सब-के-सब तेज चल रहे थे । राजा ने देखा अन्य कहार शीघ्रगामी है तथा तीव्र गति से चल रहे है, किंतु यह जो नया आया है, इसकी गति बहुत मंद है । तब वे बोले- ‘अरे ! क्या तू थक गया? अभी तो तूने थोड़ी ही दूर तक मेरी पालकी ढोयी है । क्या परिश्रम नहीं सहा जाता? क्या तू मोटा-ताजा नहीं है? देखने में तो अत्यंत हष्ट-पुष्ट जान पड़ता है ।’ 
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ब्राह्मण ने कहा- ‘राजन् ! न मैं मोटा हूँ, न मैंने तुम्हारी पालकी ढोयी है, न मुझे थकावट आई है, न परिश्रम करना पड़ा है और न मुझ पर तुम्हारा कुछ भार ही है । पृथ्वी पर दोनों पैर हैं, पैरों पर जंघाएँ हैं, जंघाओं के ऊपर ऊरू और ऊरुओं के ऊपर उदर(पेट) है । उदर के ऊपर वक्षः स्थल, भुजाएँ और कंधे है तथा कंधों के ऊपर यह पालकी रखी गई है । फिर मेरे ऊपर यहाँ कौन-सा भार है? इस पालकी पर तुम्हारा कहा जाने वाला यह शरीर रखा हुआ है । वास्तव में तुम वहाँ(पालकी में) हो और मैं यहाँ(पृथ्वी)- पर हूँ- ऐसा तो कहा जाता है, वह सब मिथ्या है । सौवीर नरेश ! मैं, तुम तथा अन्य जितने भी जीव है, सबका भार पंचभूतों के द्वारा ही ढोया जा रहा है । ये पंचभूत भी गुणों के प्रवाह में पड़कर चल रहे हैं । पृथ्वीनाथ ! सत्व आदि गुण कर्मों के अधीन है तथा कर्म अविधा के द्वारा संचित है, जो संपूर्ण जीवों में वर्तमान है । आत्मा तो शुद्ध, अक्षय(अविनाशी), शांत, निर्गुण और प्रकृति से परे है । संपूर्ण प्राणियों में एक ही आत्मा है । उसकी न तो कभी वृद्धि होती है और न हास ही होता है । राजन् ! जब उसकी वृद्धि नहीं होती और हास भी नहीं होता, तब तुमने किस युक्ति से व्यंगपूर्वक यह प्रश्न किया है कि ‘क्या तू मोटा-ताजा ननहीं है?’ यदि पृथ्वी, पैर, जंघा, ऊरू, कटि और उदर आदि आधारों एवं कँधो पर रखी हुई यह पालकी मेरे लिए भार स्वरुप हो सकती है तो यह आपत्ति तुम्हारे लिए भी समान ही है, अर्थात् तुम्हारे लिए भी यह भार स्वरूप कही जा सकती है तथा इस युक्ति से अन्य सभी जंतुओं ने भी केवल पालकी ही नहीं उठा रखी है, पर्वत, पेड़, घर और पृथ्वी आदि का भार भी अपने ऊपर ले रखा है । नरेश ! सोचो तो सही, जब प्रकृति जन्य साधनों से पुरुष सर्वथा भिन्न है तो कौन-सा महान् भार मुझे सहन करना पड़ता है? जिस द्रव्य से यह पालकी बनी है, उसी से मेरे, तुम्हारे तथा इन संपूर्ण प्राणियों के शरीरों का निर्माण हुआ है, इन सबकी समान द्रव्यों से पुष्टि हुई है ।
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यह सुनकर राजा पालकी से उतर पड़े और ब्राह्मण के चरण पकड़कर क्षमा माँगते हुए बोले- ‘भगवान् ! अब पालकी छोड़कर मुझ पर कृपा कीजिए । मैं आपके मुख से कुछ सुनना चाहता हूँ, मुझे उपदेश दीजिए । साथ ही यह भी बताइए कि आप कौन है?’ और किस निमित अथवा किस कारण से यहाँ आपका आगमन हुआ है?
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ब्राह्मण ने कहा- ‘राजन् ! सुनो- ‘मैं अमुक हूँ’- यह बात नहीं कही जा सकती तथा तुमने जो आने का कारण पूछा है, उसके संबंध में मुझे इतना ही कहना है कि कहीं भी आने-जाने की क्रिया कर्म फल का उपभोग करने के लिए ही होती है । सुख-दुःख के उपभोग ही भिन्न-भिन्न देश(अथवा शरीर) आदि की प्राप्ति कराने वाले हैं तथा धर्माधर्मजनित सुख-दुःखों को भोगने के लिए ही जीव नाना प्रकार के देश(अथवा शरीर) आदि को प्राप्त होता है ।
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राजा ने पूछा- ‘ब्राह्मन् ! ‘जो है’(अर्थात जो आत्मा सत् स्वरुप से विराजमान है तथा कर्ता-भोक्तारूप में प्रतीत हो रहा है) उसे ‘मैं हूँ’- यों कहकर क्यों नही बताया जा सकता? द्विजवर ! आत्मा के लिए ‘अहम्’ शब्द का प्रयोग तो दोषावह नहीं जान पड़ता ।’
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ब्राहमण ने कहा- ‘राजन् ! आत्मा के लिए ‘अहम्’ शब्द का प्रयोग दोषावह नहीं है, तुम्हारा यह कथन बिल्कुल ठीक है, परंतु अनात्मा में आत्मत्व का बोध कराने वाला ‘अहम्’ शब्द तो दोषावह है ही । अथवा जहाँ कोई भी शब्द भ्रमपूर्ण अर्थ को लक्षित कराता हो, वहाँ उसका प्रयोग दोषयुक्त ही है । जब संपूर्ण शरीर में एक ही आत्मा की स्थिति है, तो ‘कौन तुम और कौन मैं हूँ’- ये सब बातें व्यर्थ है । राजन् ! ‘तुम राजा हो, यह पालकी है, हम लोग इसे ढोने वाले कहार हैं, ये आगे चलनेवाले सिपाही हैं तथा लोक तुम्हारे अधिकार में है’- यह जो कहा जाता है, यह सत्य नहीं है । वृक्ष से लकड़ी होती है और लकड़ी से यह पालकी बनी है, जिसके ऊपर तुम बैठे हुए हो । सौवीर नरेश ! बोलो तो, इसका ‘वृक्ष’ और ‘लकड़ी’ नाम क्या हो गया? कोई भी चेतन मनुष्य यह नहीं कहता की ‘महाराज वृक्ष अथवा लकड़ी पर चढ़े हुए हैं ।’ सब तुम्हें पालकी पर ही सवार बतलाते हैं । किंतु पालकी क्या है? नृपश्रेष्ठ ! रचनाकला के द्वारा एक विशेष आकार में परिणत हुई लकड़ियों का समूह ही तो पालकी है । यदि तुम इसे कोई भिन्न वस्तु मानते हो तो इसमें से लकड़ियों को अलग करके ‘पालकी’ नाम की कोई वस्तु ढूँढ़ों तो सही । ‘यह पुरुष, यह स्त्री, यह गौ, यह घोड़ा, यह हाथी, पक्षी और यह वृक्ष है’- इस प्रकार कर्मजनित भिन्न-भिन्न शरीरों में लोगों ने नाना प्रकार के नामों का आरोप कर लिया है । इन संज्ञाओं को लोक कल्पित ही समझना चाहिए । जिव्हा ‘अहम्’(मैं)- का उच्चारण करती है, किंतु ये ‘अहम्’(मैं) पद के वाच्यार्थ नहीं हैं; क्योंकि ये सब-के-सब शब्दोच्चारण के साधनमात्र हैं । किन कारणों या उक्तियों से जिह्वा यह कहती है, कि ‘वाणी ही ‘अहम्’ मैं हूँ ।’ यधपि जिह्वा यह कहती है तथापि ‘यदि मैं वाणी नहीं हूँ’ ऐसा कहा जाए तो यह कदापि मिथ्या नहीं है । राजन् ! मस्तक और गुदा आदि के रुप में जो शरीर है, वह पुरुष(आत्मा)- से सर्वथा भिन्न है, ऐसी दशा में मैं किस अवयव के लिए ‘अहम्’ संज्ञा का प्रयोग करूँ? भूपाल शिरोमणे ! यदि मुझ(आत्मा)- से भिन्न कोई भी अपनी पृथक सत्ता रखता हो तो ‘यह मैं हूँ’, ‘यह दूसरा है’- ऐसी बात भी कही जा सकती है । वास्तव में पर्वत, पशु तथा वृक्ष आदि का भेद सत्य नहीं है । शरीर दृष्टि से ये जितने भी भेद प्रतीत हो रहे है, सब-के-सब कर्मजन्य हैं । संसार में जिसे ‘राजा’ या ‘राजसेवक’ कहते हैं, वह तथा और इस तरह की जितनी संज्ञाएँ हैं, वे कोई भी निर्विकार सत्य नहीं हैं । भूपाल ! तुम संपूर्ण लोक के राजा हो, अपने पिता के पुत्र हो, शत्रु के लिए शत्रु, धर्मपत्नी के पति और पुत्र के पिता- इतने नामों के होते हुए मैं तुम्हें क्या कह कर पुकारुँ? पृथ्वीनाथ ! क्या यह मस्तक तुम हो? किंतु जैसे मस्तक तुम्हारा है, वैसे ही उदर भी तो है(फिर उदर क्यों नही हो?) तो क्या इन पैर आदि अंगों में से तुम कोई हो? नहीं, तो ये सब तुम्हारे क्या हैं? महाराज ! इन समस्त अवयवों से तुम पृथक हो, अतः इनसे अलग होकर ही अच्छी तरह विचार करो कि ‘वास्तव में मैं कौन हूँ?’
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यह सुनकर राजा ने उन भगवत्स्वरुप अवधूत ब्राह्मण से कहा- ‘ब्राह्मण ! मैं आत्म कल्याण के लिए उधत होकर महर्षि कपिल के पास कुछ पूछने के लिए जा रहा था । आप भी मेरे लिए इस पृथ्वी पर महर्षि कपिल के ही अंश है, अतः आप ही मुझे ज्ञान दे । जिससे ज्ञानरुपी महासागर की प्राप्ति होकर परम कल्याण की सिद्धि हो, वह उपाय मुझे बताइए ।’
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ब्राह्मण ने कहा- ‘राजन् ! तुम फिर कल्याण का उपाय पूछने लगे । ‘परमार्थ क्या है?’ यह नहीं पूछते । ‘परमार्थ’ ही सब प्रकार कल्याणों का स्वरुप है । मनुष्य देवताओं की आराधना करके धन-संपत्ति की इच्छा करता है, पुत्र और राज्य पाना चाहता है, किंतु सौवीर नरेश ! तुम्हीं बताओ, क्या यही उसका श्रेय है? (इसी से उसका कल्याण होगा?) विवेकी पुरुष की दृष्टि में तो परमात्मा की प्राप्ति ही श्रेय है, यज्ञादि की क्रिया तथा द्रव्य की सिद्धि को वह श्रेय नहीं मानता । परमात्मा और आत्मा का संयोग- उनके एकत्व का बोध ही ‘परमार्थ’ माना गया है । परमात्मा एक अर्थात् अद्वितीय है । वह सर्वत्र समान रुप से व्यापक, शुद्ध, निर्गुण, प्रकृति से परे, जन्म-वृद्धि आदि से रहित, सर्वगत, अविनाशी, उत्कृष्ट, ज्ञानस्वरुप, गुण-जाति आदि के संसर्ग से रहित एवं विभु है । अब मैं तुम्हें निदाघ और ऋतु(ऋभु)- का संवाद सुनाता हूँ, ध्यान देकर सुनो’ ।
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‘ऋतु ब्रह्माजी के पुत्र और ज्ञानी थे । पुलस्त्यनन्दन निदाघ ने उनकी शिष्यता ग्रहण की । ऋतु से विधा पढ़ लेने के पश्चात् निदाघ देविका नदी के तट पर एक नगर में जाकर रहने लगे । ऋतु ने अपने शिष्य के निवास स्थान का पता लगा लिया था । हज़ार दिव्य वर्ष बीतने के पश्चात् एक दिन ऋतु निदाघ को देखने के लिए गए । उस समय निदाघ बलिवैश्वदेव के अनन्तर अन्न-भोजन करके अपने शिष्य से कह रहे थे- ‘भोजन के बाद मुझे तृप्ति हुई है; क्योंकि भोजन ही अक्षय तृप्ति प्रदान करने वाला है ।’ यह कहकर वे तत्काल आए हुए अतिथि से भी तृप्ति के विषय में पूछने लगे ।
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तब ऋतु ने कहा- ‘ब्राहमण ! जिसे भूख लगी होती है, उसे ही भोजन के पश्चात् तृप्ति होती है । मुझे तो कभी भूख ही नहीं लगी, फिर मेरी तृप्ति के विषय में क्यों पूछते हो? भूख और प्यास देह के धर्म है । मुझ आत्मा का ये कभी स्पर्श नहीं करते । तुमने पूछा है इसलिए कहता हूँ मुझे सदा ही तृप्ति बनी रहती है । पुरुष(आत्मा) आकाश की भाँति सर्वत्र व्याप्त है और मैं वह प्रत्यगात्मा ही हूँ, अतः तुमने जो मुझसे यह पूछा है कि ‘आप कहाँ से आते हैं?’ यह प्रश्न कैसे सार्थक हो सकता है? मैं न कही जाता हूँ, न आता हूँ और न किसी एक स्थान में रहता हूँ । न तुम मुझसे भिन्न हो, न मैं तुमसे अलग हूँ । जैसे मिट्टी का घर मिट्टी से लीपने पर सुदृढ़ होता है, उसी प्रकार यह पार्थिव देह ही पार्थिव अन्न के परमाणुओं से पुष्ट होती है । ब्राह्मण ! मैं तुम्हारा आचार्य ऋतु हूँ और तुम्हें ज्ञान देने के लिए यहाँ आया हूँ, अब जाऊँगा । तुम्हें परमार्थ तत्व का उपदेश कर दिया । इस प्रकार तुम इस संपूर्ण जगत् को एकमात्र वासुदेव-संज्ञक परमात्मा का ही स्वरुप समझो, इसमें भेद का सर्वथा अभाव है ।
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तत्पश्चात् एक हज़ार वर्ष व्यतीत होने पर ऋतु पुनः उस नगर में गये । वहाँ जाकर उन्होंने देखा- निदाघ नगर के पास एकांत-स्थान में खड़े हैं । तब वे उनसे बोले- ‘भैया ! इस एकांत-स्थान में क्यों खड़े हो?’ निदाघ ने कहा- ‘ब्राह्मण ! मार्ग में मनुष्यों की बहुत बड़ी भीड़ खड़ी है; क्योंकि ये नरेश इस समय इस रमणीय नगर में प्रवेश करना चाहते है, इसलिए मैं यहाँ ठहर गया हूँ ।’ ऋतु ने पूछा- ‘द्विज श्रेष्ठ ! तुम यहाँ की सब बातें जानते हो, अतः बताओ कि इनमें कौन नरेश है और कौन दूसरे लोग हैं?’ निदाघ ने कहा- ‘ब्राह्मण ! जो इस पर्वत-शिखर के समान खड़े हुए मतवाले गजराज पर चढ़े हैं, वे ही ये नरेश हैं तथा जो उन्हें चारों ओर से घेरकर खड़े हैं, वे ही दूसरे लोग हैं । यह नीचे वाला जीव हाथी है और ऊपर बैठे हुए सज्जन महाराज हैं ।’
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ऋतु ने कहा- ‘मुझे समझाकर बताओ, इसमें कौन राजा है और कौन हाथी?’ निदाघ बोले- ‘अच्छा बतलाता हूँ ।’ यह कहकर निदाघ ऋतु के ऊपर चढ़ गए और बोले- ‘अब दृष्टान्त देखकर तुम वाहन को समझ लो । मैं तुम्हारे ऊपर राजा के समान बैठा हूँ और तुम मेरे नीचे हाथी के समान खड़े हो ।’ तब ऋतु ने निदाघ से कहा- ‘मैं कौन हूँ और तुम्हें क्या कहूँ?’ इतना सुनते ही निदाघ उतरकर उनके चरणों में पड़ गये और बोले- ‘निश्चय ही आप मेरे गुरुजी महाराज हैं; क्योंकि दूसरे किसी का ह्रदय ऐसा नहीं है, जो निरंतर अद्वैत-संस्कार से सुसंस्कृत रहता हो ।’ ऋतु ने निदाघ से कहा- ‘मैं तुम्हें ब्रह्मा का बोध कराने के लिए आया था और परमार्थ-साभूत अद्वैत-तत्व का दर्शन तुम्हें करा दिया ।’
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ब्राह्मण(जडभरत) कहते हैं- ‘राजन् ! निदाघ उस उपदेश के प्रभाव से अद्वैतपरायण हो गए । अब वे सम्पूर्ण प्राणियों को अपने से अभिन्न देखने लगे । उन्होंने ज्ञान से मोक्ष प्राप्त किया था, उसी प्रकार तुम भी प्राप्त करोगे । तुम, मैं तथा यह संपूर्ण जगत्- सब एकमात्र व्यापक विष्णु का ही स्वरुप है । जैसे एक ही आकाश नीले-पीले आदि भेदों से अनेक-सा दिखाई देता है, उसी प्रकार भ्रान्त दृष्टि वाले पुरुषों को एक ही आत्मा भिन्न-भिन्न रुपों में दिखाई देती है ।’ इस सारभूत ज्ञान के प्रभाव से सौवीर नरेश भव-बंधन से मुक्त हो गए । ज्ञानस्वरूप ब्रह्मा ही इस अज्ञानमय संसार वृक्ष का शत्रु है, इसका निरंतर चिंतन करते रहना चाहिए ।

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