॥ दादूराम सत्यराम ॥
**श्री दादू चरितामृत(भाग-२)**
लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
**= विन्दु ९२ =**
**= दासजी का आना =**
एक दिन ठाकुरदासजी के शिष्य दासजी दादूजी महाराज को दिखाने के लिये अपनी रचित एक लाख वाणी का ग्रंथ लेकर मोरड़ा आये और दादूजी महाराज को दण्डवत करके अपना ग्रंथ दादूजी के सामने रखा, तब दादूजी ने पूछा यह क्या है ? हाथ जोड़कर दासजी ने कहा - जगतारण जहाज है अर्थात् मेरी रचित एक लाख वाणी है । तब दादूजी महाराज ने कहा - रामजी ! जितना परिश्रम इस रचना में किया, उतना राम भजन करते तो कितना अच्छा होता । इतनी बड़ी रचना की क्या अवश्यकता थी ? बड़ी रचनाओं में तो प्रायः पुनरावृत्ति ही होती है । अतः इस से कम रचना में भी अपना भाव व्यक्त करके भजन करते तो अच्छा रहता । सदा रचना में लगा रहना यह उचित नहीं है, भजन भी करना चाहिये था । फिर कहा -
"मसि कागज के आसरे, क्यों छूटे संसार ।
राम बिना छूटे नहीं, दादू भरम विकार ।"
केवल स्याही और कागज से बनी पुस्तकों के पढ़ने - सुनने मात्र से ही संसार बन्धन कैसे छूट सकता है ? निरंजन राम के भजन बिना अन्य उपाय से भ्रम और कामादि विकार नष्ट नहीं होते हैं ।
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दादूजी के उक्त वचन सुनकर दासजी को दुःख हुआ । वे तो समझते थे कि दादूजी महाराज मेरी रचना को देखकर प्रसन्न होंगे । किन्तु प्रसन्न न होकर उपालंभ दिया । इस से दासजी को बड़ा दुःख हुआ । उन्होंने अपने ग्रन्थ को उठाकर तालाब में फैंक दिया । यह देख कर जो संत वहां थे, उन्होंने उसको बचाने का प्रयत्न किया किन्तु संपूर्ण ग्रन्थ को न बचा सके । बहुत से पत्र जल में डूबकर नष्ट हो गये । इस से दासजी की वाणी पूर्ण नहीं मिलती है । फिर आगे तो दासजी निरंतर ब्रह्म भजन ही करने लगे थे, अधिक रचना करना छोड़ दिया था ।
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भक्तमाल के पद्य टीकाकार चतुरदासजी ने ५२ शिष्यों की गणना वाले पद्य में जैसे चैनजी का नाम दिया है वैसे इनका नाम भी दिया है - "लालदास नायक सो पीरांणी पटण दास" यह दास नाम उक्त दासजी का ही ज्ञात होता है । ये पटण में ही रहते थे । इनके गुरु ठाकुरदासजी भी वहां के ही थे । दासजी अच्छे संत कवि हुये है । इनकी जो रचनायें मिलती है वे अच्छी रचनायें हैं ।
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इति श्री दादू चरितामृत विन्दु ९२ समापतः ।
(क्रमशः)

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