परमगुरु ब्रह्मर्षि श्री दादूदयाल जी महाराज की अनुभव वाणी

शनिवार, 18 फ़रवरी 2017

= विन्दु ९३ (२)=

॥ दादूराम सत्यराम ॥
**श्री दादू चरितामृत(भाग-२)** 
लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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**= विन्दु ९३ =**
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दादूजी महाराज तो सब जानते ही थे कि मेरी इच्छा नारायणा में धाम बनाने की हुई थी, उसी को पूर्ण करने के लिये परमात्मा ने यह सब व्यवस्था करदी है । इससे उन लोगों की प्रार्थना स्वीकार करली । फिर मोरड़ा के भक्तों को अपने मधुर वचनों से संतुष्ट करके दूसरे दिन ही रायमल आदि के साथ शिष्यों सहित नारायणा के लिये प्रस्थान कर दिया । 
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प्रस्थान करने के पश्चात् रायमल ने एक व्यक्ति को यह कहकर आगे भेज दिया कि तुम राजा को कह देना, संत प्रवर दादूजी महाराज मोरड़ा से नारायणा के लिये चल पड़े हैं । अतः मोरड़ा के मार्ग पर आप स्वागत के लिये पधार जायें । उसने आकर राजा को उक्त सूचना दे दी । राजा ने कुछ सेवकों को भेजकर नारायणा के कुछ दूर पर एक स्थान में सफाई करके बिछायत करने की आज्ञा दे दी । उन सेवकों ने वहाँ जाकर शीघ्र ही सब कार्य कर दिया । 
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इधर राजा नारायणसिंह ने शीघ्र ही नगर के मुख्य - मुख्य लोगों को बुलाकर दादूजी के स्वागत करने के लिये चलने को कह दिया तब सब तैयार होकर एकत्र हो गये । फिर वाद्य बजाते हुये और संकीर्तन करते हुये नगर से राजा और प्रजा के लोग निकले । उधर दादूजी महाराज भी शिष्यों के सहित उक्त स्थान पर पहुँच कर विराज गये थे । इधर राजा और प्रजा भी वहाँ आ गये । 
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**= दादूजी महाराज का भव्य स्वागत =** 
राजा नारायणसिंह दादूजी का दर्शन करके अति प्रसन्न हुये और साष्टांग दंडवत प्रणाम कर हाथ जोड़े हुये सामने खड़े होकर बोले - स्वामीजी महाराज ! आपने यहां पधार कर मेरे को तथा यहां की जनता को कृतार्थ कर दिया है । हम लोग आपके दर्शनों से धन्य हो गये हैं और अपने भाग्य की श्लाघा करते हैं कि हमारा भाग्य विशाल है, तब ही तो आप सर्व हितैषी संतों का हम लोग इस समय इच्छा भरकर दर्शन कर रहे हैं । फिर राजा ने विधि के सहित दादूजी महाराज की पूजा की पश्चात् यथायोग्य सब संतों को प्रणाम किया । 
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उक्त प्रकार ही प्रजा के मुख्य - मुख्य लोगों ने भी किया और साधारण जनता दूर से ही अपने भाव के अनुसार दंडवत प्रणाम कर रही थी । फिर शिष्टाचार पूर्वक पूजा प्रणामादि हो जाने पर संकीर्तन करते हुये नगर चलने की तैयारी करने लगे । उस समय राजा ने प्रार्थना की - स्वामीजी महाराज ! आपको ठहराने के लिये अभी तो रघुनाथ मन्दिर में प्रबन्ध किया गया है । वह राज मन्दिर है, निर्विघ्न स्थान है और किले के द्वार पर ही है । इससे राज परिवार को भी आपके दर्शन का सुअवसर मिल सकेगा । फिर आपकी आज्ञानुसार ही स्थान का निश्चय करके वहां सब प्रकार का प्रबन्ध कर दिया जायगा । तब दादूजी महाराज ने कहा ठीक है । 
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दादूजी महाराज की आज्ञा होने पर शिष्यों के सहित दादूजी को लेकर संकीर्तन करते हुये नगर के मध्य से रघुनाथ - मंदिर को चले । स्थान - स्थान पर जनता दादूजी के दर्शनार्थ 'दादूजी महाराज की जय हो' इस प्रकार ध्वनि करते हुये उपस्थित थी । उन सबको अपने दर्शनों से कृतार्थ करते हुये दादूजी महाराज रघुनाथ - मंदिर की और बढ़ रहे थे । 
(क्रमशः)

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