परमगुरु ब्रह्मर्षि श्री दादूदयाल जी महाराज की अनुभव वाणी

रविवार, 26 फ़रवरी 2017

= निष्कामी पतिव्रता का अंग =(८/३१-३)


卐 सत्यराम सा 卐 
**श्री दादू अनुभव वाणी** टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
**= निष्कामी पतिव्रता का अँग ८ =** 
यहु व्रत सुन्दरि ले रहे, तो सदा सुहागिनि होइ । 
दादू भावै पीव को, ता सम और न कोइ ॥३१॥ 
यह उक्त प्रकार पतिव्रत यदि साधक - सुन्दरी धारण किये रहे तो सदा के लिए सुहागिनी हो जाती है । कारण वह परब्रह्म - पति को प्रिय लगती है, इससे ब्रह्म के साथ अभेद होकर रहती है । उसके समान भाग्यशालिनी अन्य कोई भी नहीं कही जा सकती ।
**मन हरि भावन** 
साहिब जी का भावता, कोइ करे कलि माँहि । 
मनसा वाचा कर्मना, दादू घट घट नाँहि ॥३२॥ 
३२ में कहते हैं - हरि को प्रिय लगे ऐसा कार्य मन से कोई विरला व्यक्ति ही करता है - इस कलियुग में भगवान् को प्रिय लगने वाला निष्काम भाव से पतिव्रत रूप कार्य मन, वचन और कर्म से कोई विरला भक्त ही कर पाता है । यह प्रत्येक शरीर से नहीं होता । कारण, श्रेष्ठ भक्त को छोड़कर अन्य सभी शरीरधारी इन्द्रियों को प्रिय लगने वाले कार्यों में ही संलग्न रहते हैं । 
**पतिव्रता निष्काम** 
आज्ञा माँहीं बैसे ऊठे, आज्ञा आये जाइ । 
आज्ञा माँहीँ लेवे देवे, आज्ञा पहरे खाइ ॥३३॥ 
३३ - ३५ में पतिव्रता की निष्कामता दिखा रहे हैं - जीवात्मा - पतिव्रता अपने स्वामी परब्रह्म की आज्ञानुसार ही बैठती - उठती है, आती - जाती है, लेती - देती है, पहनती - खाती है । 
(क्रमशः)

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