परमगुरु ब्रह्मर्षि श्री दादूदयाल जी महाराज की अनुभव वाणी

मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017

= १०३ =

卐 सत्यराम सा 卐
काया मांही भय घणा, सब गुण व्यापैं आइ ।
दादू निर्भय घर किया, रहे नूर में जाइ ॥ २९ ॥ 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! जब तक मन, शरीर के आकार रूप में रहता है, तब तक इसको अनेक प्रकार के भय नाम डर, काल - कर्म, जन्म - मृत्यु, संसार - बन्धन, ये सब व्याप्त होते रहते हैं । जब यह मन सतगुरु ज्ञान को प्राप्त करके निर्भय घर में कहिए, आत्म - स्वरूप में स्थिर होता है, तब यह ब्रह्मरूप हो जाता है ॥ २९ ॥
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खड्ग धार विष ना मरै, कोइ गुण व्यापै नांहि ।
राम रहै त्यों जन रहै, काल झाल जल मांहि ॥ ३० ॥ 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! सच्चे मुक्त ब्रह्मनिष्ठ पुरुष न तो तलवार से, न हलाहल से ही मर सकते हैं, जैसे प्रह्लाद, मंसूर आदि हुए और न उनको कोई शारीरिक गुण - विकार ही लगता है । इस प्रकार वे गुणातीत संतजन राम की तरह अविनाशी, अजर, अमर होकर रहते हैं । जैसे कालरूप अग्नि की झल, जल को नहीं जला सकती, वैसे ही काल और काल के जाल काम, क्रोध, जन्म, मरण, उन ब्रह्मवेत्ताओं को नहीं व्यापते हैं ॥ ३० ॥ 
मीरा अंगद आदि बहु, रघड़ दासी नेह । 
जहर दिये नाहीं मरे, सब प्रह्लाद की देह ॥ 
कवित्त
राणाजी के काका कामी, अंगद अपार नामी, 
ध्यायो है अन्तर्यामी, जहर जरायो है ।
शंकर सदैव शुद्ध प्रहलाद प्रथम भये, 
मीरा बाई मेड़ते में प्रभु पीव पायो है ॥ 
हनुमान खड़ग सौं मारे मेघनाद बचे, 
गाये सच्चे नाथ हरी नीके मन भायो है ।
हरिदास विसवासी राखिये रटत राम, 
पाये पर्म धाम श्याम भली भांति गायो है ॥ 
नाम लेत तूही तूही करै, फिर हूँही हूँही कहि पीर । 
गुरु त्रास दई शिष्य को, कट्या न रोम शरीर ॥ 
दृष्टान्त ~ एक उत्तम जिज्ञासु, किसी सच्चे महापुरुष की शरण में आकर बोला कि मुझे परमेश्‍वर प्राप्ति का उपदेश देओ । संत बोले ~ "तूं ही, तूं ही" किया कर । जब वह इस अभ्यास को करते करते तन्मय हुआ, तब "हूँही हूँही" करने लगा । गुरु बोले ~ हूँही हूँही नहीं, तूंही तूंही । फिर बोलने लगा ~ "तूंही तूंही" । फिऱ कुछ देर में होने लगी "हूँही, हूँही" । तब गुरु ने तलवार उठाकर उसके शरीर पर मारी तो तलवार इधर से उधर निकल गई, परन्तु एक रोम भी शरीर का नहीं कटा, क्योंकि वहाँ तो ब्रह्म का स्वरूप प्रकट हो गया था । गुरु ने निश्‍चय किया कि इसका उद्धार हो गया ।
(श्री दादूवाणी ~ विचार का अंग)
चित्र सौजन्य ~ नरसिँह जायसवाल


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