परमगुरु ब्रह्मर्षि श्री दादूदयाल जी महाराज की अनुभव वाणी

सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

= लै का अंग =(७/२५-२७)

卐 सत्यराम सा 卐 
**श्री दादू अनुभव वाणी** टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
**= लै का अँग ७ =** 
*अध्यात्म* 
दादू एक सुरति सौं सब रहें, पँचौं उनमनि लाग । 
यहु अनुभव उपदेश यहु, यहु परम योग वैराग ॥२५॥ 
२५ - २६ में ब्रह्माकार वृत्ति रूप अध्यात्म की विशेषता बता रहे हैं - जब अद्वैत ब्रह्म में वृत्ति लग जाती है, तब पाँचों इन्द्रिय और मन आदि सभी बाह्य विषयों में जाने से रुक जाते हैं और समाधि अवस्था में प्राप्त होने योग्य परमात्मा के स्वरूप में ही लग जाते हैं । यह उक्त साधन ही अनुभव का हेतु है, यही उत्तम उपदेश का फल है । यही परम योग है, यही श्रेष्ठ वैराग्य है ।
दादू सहजैं सुरति समाइ ले, पारब्रह्म के अँग । 
अरस परस मिल एक ह्वै, सन्मुख रहबा संग ॥२६॥ 
साँसारिक भावनाओं से अपनी वृत्ति को उठाकर लय योग द्वारा अनायास ही परब्रह्म के स्वरूप में लय करे और जल दूध के समान आपस में दोनों एक हो जायं । इसका नाम सदा सन्मुख रहकर संग रहता है । 
सुरति सदा सन्मुख रहे, जहां तहां लै लीन । 
सहज रूप सुमिरण करे, निष्कामी दादू दीन ॥२७॥ 
२७ - २८ में लय योग और उसके साधक का परिचय दे रहे हैं - निष्कामी नम्र भक्त - जनों की वृत्ति सदा परब्रह्म के सन्मुख रहती है, साँसारिक भोग - वासनादि में नहीं जाती और वे घर, वनादि जिस किसी भी स्थान वो अवस्था में सहज स्वरूप ब्रह्म का स्मरण करते हुये वृत्ति को ब्रह्म में ही लीन रखते हैं । उनकी उक्त अवस्था का नाम ही लय - योग है ।
(क्रमशः)

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