परमगुरु ब्रह्मर्षि श्री दादूदयाल जी महाराज की अनुभव वाणी

रविवार, 12 फ़रवरी 2017

= लै का अंग =(७/१६-१८)

卐 सत्यराम सा 卐 
**श्री दादू अनुभव वाणी** टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
**= लै का अँग ७ =** 
सुरति समाइ सन्मुख रहे, जुग जुग जन पूरा ।
दादू प्यासा प्रेम का, रस पीवे सूरा ॥१६॥
मन इन्द्रियों के जीतने में शौर्य दिखाने वाला, प्रभु - प्रेम का प्यासा, अपनी वृत्ति निरन्तर निरंजन राम में लगाकर, राम की आज्ञा में रहता हुआ राम भजन - रस का पान करता है, वह प्रत्येक युग में ही पूरा भक्त माना जाता है ।
*अध्यात्म*
दादू जहां जगद्गुरु रहत है, तहां जे सुरति समाइ ।
तौ इन ही नैनहुं उलट कर, कौतुक देखे आइ ॥१७॥
१७ - २१ में लययोग द्वारा साक्षात्कार की पद्धति बताते हुये इसे करने की प्रेरणा कर रहे हैं - जहां हृदय में अष्टदल कमल पर सँपूर्ण जगत् में महान् जगद्गुरु परमात्मा का विशेष रूप से निवास है, वहां ही यदि निरन्तर वृत्ति लग जाय तो इन बाह्य विचार - नेत्रों को आन्तर ब्रह्म विचार में बदल के निर्द्वन्द्व स्थिति में आकर साधक आश्चर्य रूप ब्रह्म का साक्षात्कार करता है ।
अख्यूँ१ पसण२ के पिरी,३ भिरे४ उलथ्थौ५ मँझ६ ।
जित्ते७ बैठौ माँ८ पिरी, निहारी९ दो हँझ१०॥१८॥
हे साधक सन्तो१० ! तुम अपने दोनों नेत्रों१ को प्रियतम३ प्रभु के दर्शनार्थ२ बाह्य विषयों से फेर४ कर तथा हृदय की ओर उलट५ कर जहां७ हृदय६ में हमारे८ प्रियतम परमेश्वर विशेष रूप से स्थित हैं, वहां ही उनका साक्षात्कार९ करो । 
(क्रमशः)

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