卐 सत्यराम सा 卐
**श्री दादू अनुभव वाणी** टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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**= लै का अँग ७ =**
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दादू उलट अनूठा आप में, अंतर शोध१ सुजाण ।
सो ढिग तेरे बावरे, तज बाहर की बाण२॥१९॥
हे तत्वज्ञानहीन बावरे ! बाह्य विषयों में निमग्न रहने का स्वभाव२ छोड़, सत्संग द्वारा सुजान होकर अपने मन और इन्द्रियों को बाह्य - विषय - प्रवृत्ति से पीछे की ओर लौटाकर हृदयस्थ परमात्मा को अपने भीतर ही खोज१ । वह व्यापक होने से तेरे अत्यन्त समीप ही है=तेरा आत्मस्वरूप ही है ।
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सुरति अपूठी फेरि कर, आतम माँहीं आण ।
लाग रहे गुरुदेव सौं, दादू सोइ सयाण ॥२०॥
गुरुदेव के उपदेश विचार द्वारा अपनी वृत्ति को बाह्य विषयों से पीछे की ओर लौटाकर तथा आत्मा में लाकर जो निरँतर ब्रह्मात्मा के अभेद चिन्तन में लगा रहता है, वही बुद्धिमान् साधक है ।
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जहां आत्म तहं राम है, सकल रह्या भरपूर ।
अन्तरगत ल्यौ लाइ रहु, दादू सेवक शूर ॥२१॥
जहां शरीर के भीतर अन्त:करण में आत्मा है, वहां ही व्यापक होने से निरंजन राम भी है । अत: हे भगवत् - सेवकों में वीर या कामादि को जय करने वाले वीर साधक ! तुम भीतर स्थित ब्रह्म में ही निरँतर वृत्ति लगा करके सँसार में रहो ।
(क्रमशः)

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