परमगुरु ब्रह्मर्षि श्री दादूदयाल जी महाराज की अनुभव वाणी

शनिवार, 25 फ़रवरी 2017

= निष्कामी पतिव्रता का अंग =(८/२८-३०)


卐 सत्यराम सा 卐 
**श्री दादू अनुभव वाणी** टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
**= निष्कामी पतिव्रता का अँग ८ =** 
**कथनी बिना करणी**
जहां नाम तहं नीति चाहिए, सदा राम का राज ।
निर्विकार तन मन भया, दादू सीझे काज ॥२८॥
२८ में कह रहे हैं - कथन के बिना ही कर्त्तव्य करना चाहिए - जिस शरीर में, "मैं भक्त हूं" ऐसा नाम वर्तता है अर्थात् जिसको सब "भक्त जी" कहते हैं और वह स्वयँ भी भक्त नाम से सहर्ष बोलता है, उसमें भक्तों की रीति - नीति भी होनी चाहिए तथा उसके हृदय में सदा राम का ही राज्य रहना चाहिए अर्थात् रामाज्ञा उसे अवश्य पालनी चाहिये और अपने कर्त्तव्य का कथन अन्यों के आगे नहीं करना चाहिए । ऐसा जिन भक्तों ने किया है, उनके तन - मनादि सब विकारों से रहित हो गये हैं । इस निर्विकारावस्था के प्राप्त होते ही साधक का मुक्ति रूप कार्य सिद्ध हो जाता है ।
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**सुन्दरी विलाप** 
जिसकी खूबी खूब सब, सोई खूब संभार । 
दादू सुन्दरि खूब सौं, नख शिख साज संवार ॥२९॥ 
२९ - ३१ में जीवात्मा सुन्दरी को परब्रह्म प्राप्ति के लिए विलापादि करने की प्रेरणा कर रहे हैं - जिस परब्रह्म की सुन्दरता से सब विश्व सुन्दर हो रहा है, उसी सत्य - शिव - सुन्दर ब्रह्म का ध्यान करो । इस प्रकार उस सुन्दर ब्रह्म के ध्यान और विलापादि द्वारा पैर के नख से लेकर शिर की शिखा पर्यन्त सारे शरीर को सर्वथा सुन्दर बना कर जीवात्मा रूप पतिव्रता सुन्दरी उस ब्रह्म से अभेद हो जाती है ।
दादू पँच आभूषण पीव कर, सोह सब ही ठांव । 
सुन्दरि यहु श्रृंगार कर, ले ले पीव का नाँव ॥३०॥ 
पाँच आभूषण और सोलह श्रृंगारों के सभी स्थानों में परब्रह्म रूप पति को ही स्थापन करे । जीवात्मा - सुन्दरी यह उक्त श्रृंगार करके विलापपूर्वक परब्रह्म पति का नाम लेते हुये उसी में अपनी वृत्ति लगावे । 
(क्रमशः)

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