#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*श्री दादू अनुभव वाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
*श्री दादू अनुभव वाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
.
*मन का अँग १०*
.
निश्चल करताँ जुग गये, चँचल तब ही होहि ।
दादू पसरे पलक में, यहु मन मारे मोहि ॥९१॥
इस मन को निश्चल करते - करते तो युग व्यतीत हो जाते हैं और चँचल
तो तत्काल ही होकर एक पल में विषयों में फैल जाता है तथा यह साधक को मायिक
पदार्थों से मोहित करके पुन: विषयासक्त करना रूप ताड़ना देता है ।
.
दादू यहु मन मींडका,
जल सौं जीवे सोइ ।
दादू यहु मन रिंद१ है, जनि रु पतीजे कोइ ॥९२॥
यह मन मेंढक के समान है जैसे मेंढक मर कर भी वर्षा के जल से
पुन: जीवित हो जाता है वैसे ही मन भी निर्विषय रूप मत्यु को प्राप्त होने पर भी
विषय जल स्पर्श होते ही पुन: विषयासक्ति रूप जीवित भाव को प्राप्त हो जाता है और
यह मन है भी स्वेच्छाचारी१ । अत: इसका कोई भी साधक विश्वास न करे ।
.
माँहीं सूक्षम ह्वै रहे, बाहर पसारे अँग ।
पवन लाग पौढा भया, काला नाग भुवँग ॥९३॥
जैसे काला सर्प शीतकाल में बांबी आदि में छिपा रहता है तब तक तो
वह कृतश रहता है किन्तु उएणकाल में पूर्वी वायु लगते ही वह पुन: प्रौढ़ावस्था को
प्राप्त हो जाता है । वैसे ही यह मन भी गुरु उपदेश और साधन द्वारा जब तक अन्तर्मुख
रहता है तब तक तो सूक्ष्म बना रहता है किन्तु बहिर्मुख होते ही पुन: अपने सँकल्प -
विकल्प अँगों को मायिक प्रपँच में फैला देता है ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें