#daduji
॥ दादूराम सत्यराम ॥
*श्री दादू चरितामृत(भाग-२)*
लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*= विन्दु ९८ =*
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उक्त कथायें सुनाकर फिर परशुरामजी महाराज बोले -
“परशराम दादू चल्या, मिल्या निरंजन जाय ।
जगत अंधेरा हो गया, सूरज गया छिपाय ॥
दादूजी तो नश्वर शरीर को छोड़कर इस पृथ्वी से चले गये हैं तथा निरंजन राम को प्राप्त हो गये हैं किन्तु जैसे सूर्य छिपने से अंधेरा हो जाता है, वैसे ही दादूजी के जाने से जगत में अज्ञान रूप अंधकार हो गया है ।
क्यों तो सूरज ऊगियो, कैसे गयो छिपाय ।
परशुराम दादू बिना, कमल गयो कुम्हलाय ॥
यदि आप लोग प्रश्न करैं कि - दादू रूप सूर्य क्यों तो उदय हुआ था फिर क्यों छिप गया है ? तो संतों ! उसका उत्तर यह है - भगवान् की आज्ञा से जिज्ञासुओं के हृदय का अज्ञान रूप अंधकार हटाने के लिये उदय हुआ था और अनन्त जिज्ञासुओं के हृदय का अज्ञानांधकार हटाकर भगवान् की आज्ञा से ही छिप गया है । अतः उन दादूजी के बिना हीं मेरा मुख - कमल कुम्हालाया है । अन्य कोई भी कारण नहीं है ।
सब घसियारे परशुराम, खोद खाय हैं घास ।
हरि हीरों की कोठड़ी, जन दादू के पास ॥”
फिर संतों ने कहा - एक दादूजी ही गये हैं, उनकी विचारधारा वाले और बहुत से संत हैं, उन्हें देखकर प्रसन्न रहिये । तब परशुरामजी महाराज ने कहा - संतों ! एक तो घास खोदकर अपना निरवाह करने वाला व्यक्ति है और एक जिसके पास हीरों की कोठड़ी भरी है, ऐसा धनी साहूकार है । उक्त दोनों व्यक्तियों में अन्तर अवश्य ही होता है । अन्य जो भी दादूजी की विचारधारा वाले संत हैं, वे तो दादूजी जैसे संतों के वचनों रूप खुरपों द्वारा भक्तजन रूप पृथ्वी से भोजन, भेंटादि रूप घास खोदकर खाते हुये अपना निर्वाह करने वाले हैं किन्तु दादूजी तो हरि स्वरूप का प्रतिपादन करने वाले वचन रूप हीरों की कोठड़ी ही थे अर्थात् जैसे हीरों की कोठड़ी से हीरे निकलते है, वैसे ही उन दादूजी से उक्त प्रकार के वचनरूप हीरे निकलते ही रहते हैं ।
इसलिये दादूजी के समान तो दादूजी ही थे, दादूजी के समान अन्य कैसे हो सकते हैं उक्त प्रकार परशुरामजी महाराज ने सलेमाबाद में अपनी गद्दी पर विराजे रहकर दादूजी के ब्रह्मलीन होने का परिचय वि० सं० १६६० ज्येष्ठ कृष्णा अष्टमी शनिवार को पहर दिन चढ़े दादूजी के ब्रह्मलीन होने के ठीक समय पर ही अपनी योग शक्ति से जानकार पास बैठे हुये संतों को दिया था ।
उक्त तीन साखी दादूजी के चरित्र ग्रंथों में मिलती हैं । मैंने(लेखक ने) ये “दादू सार” ग्रन्थ से यहां दी हैं । अब ब्रह्मलीन होने के समय जो नारायणा नगर में हुआ सो लिखा जा रहा है । दो स्थानों की कथा एक साथ तो लिखी नहीं जा सकती थी । सलेमाबाद की कथा थोड़ी थी सो पहले दे दी गई है ।
(क्रमशः)

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