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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
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*ना वह मिलै, न हम सुखी, कहो क्यों जीवन होइ ।*
*जिन मुझको घायल किया, मेरी दारु सोइ ॥*
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*विरह-वियोग ॥*
आसा रे अलूधी रमइयौ कब मिलै, मिलियाँ हूँ जाण न देस ।
आँचल गहि करि राखिस्यौं रे, नैनाँ म्हारा नीर भरेस ॥टेक॥
राम रहुकौ म्हारौ मनि बस्यौ, बीसार्यौ नहिं जाइ ।
जे कबहूँ दिन बीसरौं रे, तौ रैंणि खटूकै आइ ॥
जे सोऊँ तौ दोइ जणाँ रे, जे जागूँ तौ येक ।
सेज ढढोलुँ पिय ना लहूँ, म्हारै पड्यौ कलेजै छेक ॥
बार लगाईं बालमा रे, बिरहनि करै बिलाप ॥
कोइ यक आडौ ह्वै रह्यौ, म्हारौ पुर्व जनम कौ पाप ॥
बालपणा तैं बाटड़ी, बूढापा लग दीठ ।
कहि बषनां आवो हरी, म्हारा बलता बुझै अंगीठ ॥३५॥
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अलूधी = अटकी । आँचल = वस्त्र । रहुकौ = रहवास, निवास । खटूकै = खटकता है, स्मृति में आता है । ढढोलुँ = ढूंढूँ । छेक = छिद्र । बार = देरी । आडौ =प्रतिबंधक । बाटड़ी = आने की राह । दीठ = देखी है । बलताँ = जलती हुई । अंगीठ = हृदय रूपी अंगीठी विरह रूपी अग्नि से जलता हुआ रुक सके । बलता क्रिया के आधार पर अंगीठ = अंगों के लिये प्रयुक्त हुआ भी माना जा सकता है । तब इसका अर्थ होगा, विरहाग्नि में जलते मेरे अंग-अंह शीतल हो जायेंगे ।
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परम-प्रियतम रमैया मुझे कब मिलेगा, मेरे मन की वृत्ति बस इसी आशा = विचार में अटकी पड़ी है । मेरा दृढ़ निश्चय है कि मिलने पर मैं उसे पुनः जाने नहीं दूंगी । यदि वह जाने का आग्रह करेगा भी तो मैं नेत्रों में आँसुओं को भरकर रो-रो कर, बिसूर-बिसूर कर उसके हृदय को पिघलाकर तथा उसका आँचल दृढ़ता से पकड़कर उसे रख लूंगी अर्थात् जाने नहीं दूंगी ।
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रामजी का निवास मेरे हृदय में होना ही चाहिये यह बात मेरे हृदय में अच्छी तरह बस गई है । इसे मैं विस्मृत करना चाहूँ तब भी विस्मृत नहीं कर सकती । कदाचित् लोकव्यवहार को पूरा करते समय दिन में मैं उसे भूल भी जाती हूँ तो रात्रि में वह स्वतः ही मेरी स्मृतिपटल पर प्रकट हो जाता है ।
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वस्तुतः जब मैं सोती हूँ तब मेरे रोम-रोम में उसकी ही स्मृति रहने से हम दो जने होते हैं किन्तु जब जागती हूँ तब बाह्यतः मैं अकेली ही रह जाती हूँ । प्रियतम को न पाकर मैं व्याकुल हुई सेज = पलंग पर उसको ढूंढती हूँ किन्तु वह वहाँ हो तो मिले । वह मिलता नहीं है । परिणामस्वरूप मेरा हृदय छलनी-छलनी हो जाता है ।
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हे प्रियतम ! तूने आने में अत्यन्त विलम्ब कर दिया है । विरहनी तेरे न आने के कारण बिलाप कर रही है । ऐसे अनुभव होता है कि तेरे न आने में मेरे पूर्वजन्म के किसी या किन्हीं पापों ने आड़ लगा रखी है, वे प्रतिबन्धक बने हुए हैं ।
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बषनां कहता है, निवेदन करता है, मैंने आपके आने की राह बाल्यावस्था से इस वृद्धावस्था तक देखी है । अतः हे हरि ! आओ और मुझे दर्शन देकर मेरे हृदय में जल रही विरह रूपी अग्नि की अंगीठी को शांत करो ॥३५॥
(क्रमशः)
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