परमगुरु ब्रह्मर्षि श्री दादूदयाल जी महाराज की अनुभव वाणी

सोमवार, 24 फ़रवरी 2025

॥निश्चय॥

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
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*भरि भरि प्याला, प्रेम रस, अपणे हाथ पिलाइ ।*
*सतगुरु के सदिकै किया, दादू बलि बलि जाइ ॥*
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राग रामकली ॥२॥निश्चय॥
म्हारै गुरि कहियौ सोइ करिस्यूँ हो ।
खार समँद मैं मीठी बेरी, करि सूधै घड़िलै भरिस्यूँ हो ॥टेक॥
इहिं कूवै को को पणिहारी, को को लेज न टूटी हो ।
पाणी लगैं पहूँती नांहीं, ठाली ठिलिया फूटी हो ॥
आगैं जो पणिहारी होती, त्याँह नैं गुर भरि दीता हो ।
नीगुणगारी या पणिहारी, रह्यौ पणिहड़ौ रीतौ हो ॥
पाँच तिसाया कुवै खिंदाया, त्याँह की त्रिष्ना भागी हो ।
गुर कौ सब्द छेहड़ै बांध्यौ, लेज पहूँचण लागी हो ॥
अैसा पाणी और न जाणी, जिह पीया तिस भागै हो ।
बषनां नैं गुर दादू पायौ, पीवत मीठा लागै हो ॥३७॥
खार समँद = संसारासक्त शरीर । मीठी बेरी = मीठे जल का कुवा = साधु-सज्जन पुरुषों की संगति । सूधै घड़िलै = शुद्ध हृदय । भरस्यूँ = भजन-भक्ति से शुद्धहृदय को भरुंगा । पणिहारी = संसारी, भेषधारी । लेज = लय-रस्सी । पाणी = रामनाम-स्मरण, भक्ति । ठाली = भक्ति शून्य । ठिलिया = काया । फूटी = खाली रह गई । आगैं जो पणिहारी = साधु-संत, भक्त । पणिहड़ौ = शरीर । पाँच = पाच ज्ञानेन्द्रियाँ । कूवै = सत्संग । छेहड़ै = किनारे पर = हृदय में धारण कर लिया । लेज = लय = वृत्ति । पाणी = नाम, प्रेम । तिस = प्यासा = माया की चाहना ॥
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मैं वही करुंगा, जिसको करने का मेरे गुरु ने मुझे उपदेश दिया है । मेरे गुरु के उपदेशानुसार मैं मेरे विषयभोगों में आकंठ आसक्त शरीर को आत्मबोध कराने वाली सत्संगति से शुद्ध करके हृदय में रामनाम-स्मरण रूपी भक्ति को स्थापित करुंगा ।
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इस संसार में जन्मे किस-किस जीव की वृत्ति संसार के लुभावने भोगों को देख-देखकर उनमें आसक्त नहीं हुई है ? अर्थात् आसक्त हुई है और उनकी मनोवृत्ति परमात्मा की ओर से हटी है । उनकी चित्तवृत्ति रामनाम रूपी भक्ति की ओर उन्मुख हुई ही नहीं । परिणामस्वरूप भक्तिशून्यावस्था में ही उनकी मृत्यु हो गई है ।
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जो मुमुक्षु परमात्मा के आगै = सन्मुख हो जाते हैं “सम्मुख होहिं जीव मोहि जबही । जन्म कोटि अघ नासहिं तबही ॥” उन्हें गुरु महाराज वैराग्य, भक्ति और ज्ञान सम्पन्न बना देते हैं । जो जीव अवगुणग्राही हैं, अवगुणी हैं, गुरु की शरण का अवलंबन नहीं करते हैं उनका शरीर, अंतःकरण भक्तिशून्य ही रह जाता है ।
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पाँचों ज्ञानेन्द्रियों को संतों का उपदेश सुनने, मनन-चिंतन करने में लगा दीया जिससे संसारी सुखों को प्राप्त करने की तृष्णा उनकी समाप्त हो गई । गुरु महाराज द्वारा प्रदत्त भगवन्नाम रूपी शब्द को वृत्ति के साथ जोड़ दिया जिससे वृत्ति शब्दमय हो गई । शब्द ही परब्रहम है । “तस्य वाचक प्रणवः” ॥योगसूत्र॥ “अक्षराणामकारोऽस्मि” गीता ॥
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ऐसा साधन भगवन्नाम के अतिरिक्त और दूसरा नहीं है जिसके करने से विनश्वर भोगों को भोगने की तृष्णा का अंत होता हो । बषनां को दादूजी जैसा गुरु मिला है जिनके उपदेश सुनने में, आचरण करने में और परिणाम देने में मीठे ही मीठे लगते हैं ॥३७॥
(क्रमशः)

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