परमगुरु ब्रह्मर्षि श्री दादूदयाल जी महाराज की अनुभव वाणी

शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2025

*४४. रस कौ अंग ११३/११६*

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*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*४४. रस कौ अंग ११३/११६*
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इस मारग मंहिं आइ करि, काहे अटकै बीच ।
जगजीवन तहँ पहुँचिये, रोम रोम रस सींच ॥११३॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि हे जीवात्मा प्रभु के मार्ग में आकर फिर बीच में क्यों रुकते हो जहाँ वास्तविक विश्राम है प्रभु शरण वहां ही पहुंचो । और अपने हर रोम में राम रस सिंचित कर लीजिये ।
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निरमल कीजै आरती, रांम नांम ल्यौ लाइ ।
तौ जगजीवन प्रेम रस, पीवै प्रांण अघाइ ॥११४॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि शुद्ध मन से प्रभु की आरती करें । और राम नाम की लिव लगा लें । तब ये प्राण भरपूर जी भर कर प्रेमरस का पान करेंगे ।
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जब लग जीवन जीव७ है, तब लग पीस्यां८ प्रेम ।
जगजीवन हारी भजन सौं, हियड़ा होसी हेम९ ॥११५॥
७. जीवन जीव=प्राणियों में प्राण । ८. पीस्यां=पीवेंगे । ९. हेम=सुवर्ण ।
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जब तक शरीर में प्राण हैं तब तक प्रेम पान करेंगे । इस प्रकार हरि भजन से ह्रदय स्वर्ण जैसा मूल्यवान हो जायेगा निर्मल शुद्ध हो जायेगा ।
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आदि देव अमर स्थान, अलख लखिआनंद कृतं ।
कहि जगजीवन निरख नूर१०, जागि जन अम्रित क्रितं ॥११६॥
१०. नूर=तेज ।
संत जगजीवन जी कहते हैं कि दादूजी महाराज ही हमारे आदि देव हैं जो अमर स्थान पर विराजते हैं । उनको देखने मात्र से ही जीव अमृत प्राप्ति सा अनुभव करता है ।
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सांठो११ हरि मंहि रस रहै, मीठौ लागै मांहि ।
कहि जगजीवन परमारथ करि, कोइ दुख व्यापै नांहि ॥११७॥
११. सांठो=इक्षु (ईख) ।
संत जगजीवन जी कहते हैं कि सद्गुण ईख के रस जैसे मीठे लगते हैं । ऐसे ही जो दूसरों की भलाई करते हैं उन्हें कोइ दुख नहीं व्यापता है ।
इति रस का अंग संपूर्ण ॥४४॥ 
(क्रमशः)

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