परमगुरु ब्रह्मर्षि श्री दादूदयाल जी महाराज की अनुभव वाणी

रविवार, 9 फ़रवरी 2025

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*जब निराधार मन रह गया,*
*आत्म के आनन्द ।*
*दादू पीवे रामरस, भेटे परमानन्द ॥*
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*साभार ~ @Subhash Jain*
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भाषा सत्य को व्यक्त नहीं कर सकती। यदि मानवता समाप्त हो जाए, तो सारी भाषाएँ भी समाप्त हो जाएँगी। लेकिन अस्तित्व बना रहेगा। जब मनुष्य पृथ्वी पर आया था, तब भी अस्तित्व था, और यदि कभी तीसरा विश्व युद्ध हो जाए और मनुष्य आत्म-विनाश कर ले, तब भी अस्तित्व बना रहेगा। पेड़ फलते-फूलते रहेंगे, बसंत आएगा, फूल खिलेंगे, पक्षी गाएँगे। रात को चाँद चमकेगा, सुबह सूरज निकलेगा।
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याद रखना, कोई तुम्हें याद भी नहीं करेगा—सबकुछ वैसा ही चलता रहेगा। मनुष्य बहुत छोटा है। क्योंकि हम मनुष्यों के संसार में रहते हैं, हम लोगों के साथ जीते हैं, इसलिए हमें लगता है कि मनुष्य ही सब कुछ है। इसलिए भाषा इतनी महत्वपूर्ण लगती है। लेकिन जब तुम मौन होते हो, तो तुम अस्तित्व के साथ एक लय में होते हो।
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जब तुम नहीं बोलते, तब तुम मानव-निर्मित इस छोटे से दायरे से बाहर हो जाते हो और इस विराट अस्तित्व का हिस्सा बन जाते हो। मौन अद्भुत है। सत्य केवल मौन के माध्यम से जाना जा सकता है। और जब सत्य मौन में जाना जाता है, तो इसे व्यक्त भी केवल मौन के माध्यम से किया जा सकता है। यदि यह मौन में जाना गया है, तो इसे शोर के माध्यम से कैसे व्यक्त किया जा सकता है? भाषा तो केवल शोर है।
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सत्य को किसी तर्क-वितर्क की आवश्यकता नहीं है—क्योंकि सत्य किसी तर्क या बहस से तय नहीं किया जा सकता। जब तुम बहस करते हो, तो वह केवल अहंकारों की लड़ाई होती है—तुम्हारा सत्य बनाम किसी और का सत्य। दो अहंकार टकराते हैं, और तुम्हें यह सिद्ध करना होता है कि तुम सही हो।
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कई बार तुम्हें महसूस भी होता है कि दूसरा व्यक्ति सही कह रहा है, लेकिन फिर भी तुम उसे स्वीकार नहीं कर सकते। तुम्हारा अहंकार इसे स्वीकार नहीं कर सकता—यह अहंकार के लिए बहुत बड़ी हार होगी। इसलिए तुम लड़ते रहते हो। भाषा मनुष्य की खोज है। लेकिन सत्य कोई खोज नहीं है, सत्य तो एक खोज का विषय नहीं, बल्कि एक पुनः-खोज (Rediscovery) है। सत्य पहले से ही मौजूद है।
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अग्नि पहले से है, लेकिन 'अग्नि' शब्द नहीं था। परमात्मा पहले से है, लेकिन 'परमात्मा' शब्द नहीं था। फिर भी लोग इस पर लड़ते रहते हैं कि उसे 'गॉड' कहा जाए या 'अल्लाह' या 'राम'। परमात्मा का कोई नाम नहीं है। सत्य निराकार है। भाषा के किसी भी लेबल की आवश्यकता नहीं है।
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मौन ईश्वर-प्रदत्त है, भाषा मनुष्य द्वारा बनाई गई है। यदि तुम ईश्वर को जानना चाहते हो, तो तुम्हें ईश्वर-प्रदत्त चीज़ों से गुजरना होगा। मौन ही वह सेतु है, जिसके माध्यम से तुम दिव्यता से पुनः जुड़ सकते हो। परमात्मा हमेशा है—उसमें कोई 'था' या 'होगा' नहीं है। परमात्मा बस "है", और इसी "हैपन" को ज़ेन परंपरा में 'तथाता'(Tathata) कहा जाता है—"ऐसा ही है"।
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इस तथाता को भाषा में व्यक्त नहीं किया जा सकता। भाषा इसे विभाजित कर देगी—भूत, वर्तमान और भविष्य में। और जैसे ही तुम समग्रता को विभाजित करते हो, तुम उसे नष्ट कर देते हो। प्रबुद्धता को खोजा नहीं जा सकता; यह कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे खोजकर प्राप्त किया जा सके। यह पहले से ही मौजूद है। बस तुम्हें अपनी गंभीरता छोड़नी होगी। यह जो खोजने वाला मन है, इसे त्यागना होगा।
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परमात्मा को खोजा नहीं जा सकता, क्योंकि परमात्मा पहले से ही यहीं है। लेकिन तुम खोजते हो, इसलिए चूक जाते हो। खोज छोड़ दो, इच्छाएँ छोड़ दो, भविष्य छोड़ दो, आशाएँ छोड़ दो—और अचानक तुम नहीं रहोगे, केवल परमात्मा रह जाएगा। तुम्हारा अस्तित्व ही तुम्हारी खोज में है।
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साधक का मन ही अहंकार है। तुम धन चाहते हो, तुम ध्यान चाहते हो, तुम शक्ति चाहते हो, और फिर किसी दिन तुम स्वर्ग चाहते हो—लेकिन तुम्हें हमेशा कुछ न कुछ चाहिए। तुम्हारी चाहत कभी समाप्त नहीं होती। यह प्रबुद्धता, और इसकी खोज भी, सिर्फ एक नई इच्छा बन जाती है।
— ओशो
ज़ेन: विरोधाभास का मार्ग (भाग 2)

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