परमगुरु ब्रह्मर्षि श्री दादूदयाल जी महाराज की अनुभव वाणी

रविवार, 2 नवंबर 2025

*७. काल चितावनी कौ अंग ४५/४७*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*७. काल चितावनी कौ अंग ४५/४७*
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मोह काल की पासि है, सुन्दर निकसै कौंन ।
पिता पुत्र संग जलि मुवौ, अग्नि लगी जब भौंन ॥४५॥
मोह वासना रूप मृत्यु के पंजे से कौन प्राणी मुक्ति पा सका है । भवन(घर) में जब अग्नि लगती है तो पुत्र के जलने पर उसका पिता भी पुत्रमोहवश उसमें जाकर जल मर जाता है ॥४५॥
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जो जो मन मैं कल्पना, सो सो कहिये काल । 
सुन्दर तूं निःकल्प हो, छाडि कल्पना जाल ॥४६॥
मानसिक सङ्कल्प विकल्प : इसी प्रकार, प्राणी के मन में उठने वाले मिथ्या सङ्कल्प विकल्पों(राज्य प्राप्ति आदि की कल्पना) को भी मृत्यु ही समझना चाहिये । श्रीसुन्दरदासजी उपदेश करते हैं - अतः हे साधक ! तू इस मिथ्या सांसारिक कल्पना जाल का सर्वथा त्याग कर निर्विकल्प समाधि में रत हो जा ॥४६॥
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काल ग्रसै आकार कौं, जामैं सकल उपाधि । 
निराकार निर्लेप है, सुन्दर तहां न ब्याधि ॥४७॥
यह मृत्यु सभी उत्पन्न सोपाधिक वस्तुओं का नाशक है । वहाँ निरुपाधिक(निर्लेप) तो केवल निरञ्जन निराकार प्रभु हैं । उन में किसी प्रकार की व्याधि(उपद्रव) नहीं है ॥४७॥
(क्रमशः) 

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