परमगुरु ब्रह्मर्षि श्री दादूदयाल जी महाराज की अनुभव वाणी

गुरुवार, 6 नवंबर 2025

*८. नारी पुरुष श्लेष को अंग ९/१२*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*८. नारी पुरुष श्लेष को अंग ९/१२*
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नारी नीकै बोलई, सुन्दर तब सुख भौंन । 
जब नारी चुप करि रहै, तब पिय पकरै मौंन ॥९॥
जब तक नारी या नाडी की ध्वनि भली रहती है तब तक तो उनके स्वामी को वे प्रिय ही लगती हैं; श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - पर जब उस नारी एवं नाडी की ध्वनि विपरीत होने लगती है तब उन के स्वामी चिन्तावश, किङ्कर्तव्यविमूढ होकर, मौन हो जाते हैं ॥९॥
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पुरुष सदा डरपत रहै, सुन्दर डोलै साथ । 
नारी छूटै हाथ तैं, तब कत आवै हाथ ॥१०॥
बुद्धिमान् पुरुष एवं कुशल वैद्य दोनों ही क्रमशः नारी एवं नाडी से बहुत सावधान रहते हैं कि वे हाथ से न निकल जायँ । क्योंकि ये दोनों जब हाथ से छूट जाती हैं तो इन का पुनः हाथ में आना असम्भव के समान हो जाता है ॥१०॥
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नारी निरखै रात दिन, अति गति बांध्यौ मोह । 
सुन्दर बार लगै नहीं, पल मैं होइ बिछोह ॥११॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - पुरुष ने निरन्तर नारी में आसक्त होकर उस में अतिशय मोह बांध लिया है । परन्तु अतिशय सावधानी रखने पर भी, उस को उससे वियुक्त होने में अधिक समय नहीं लगता । वह तो क्षण भर में ही वियुक्त(पृथक्) होने की स्थिति में आ जाती है । (यही बात नाडी के विषय में भी समझ लेनी चाहिये) ॥११॥
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नारी मैं बल पुरुष कौ, पुरुष भयौ बसि नारि । 
अपुनौ बल समुझै नहीं, बैठौ सर्बस हारि ॥१२॥
संसार में नारी पुरुष के बल पर समस्त कृत्य करती है; इसी प्रकार, पुरुष भी नारी के अधीन हुआ रहता है । वे दोनों ही अपनी अपनी सामर्थ्य का महत्त्व नहीं समझते; इसी कारण वे संसार में अपना सर्वस्व(सब कुछ) हार जाते हैं ॥१२॥
(क्रमशः) 

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