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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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८ आचार्य निर्भयरामजी
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राजगढ पधारना ~
वि. सं. १८६८ में आचार्य निर्भयरामजी महाराज राजगढ पधारे । वहां पर उस समय बहुत से उतराधे संत मिले । गोविन्ददासजी आचार्य निर्भयरामजी महाराज का स्वागत सामेला करने आये और ८००) रु. भेंट किये । ठंडीरामजी की ओर से ५००) रु. भेंट हुये । अन्य संत भक्तों ने भी श्रद्धा शक्ति अनुसार भेंटें कीं ।
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अलवर नरेश का आना ~
इन्हीं दिनों में अलवर नरेश वक्तावरसिंह राजगढ के पर्वतों में शिकार करने के लिये आये थे । वहां पर सुना कि नारायणा दादूधाम के आचार्य निर्भयरामजी महाराज यहां पधारे हुये हैं । यह सुनकर वक्तावर सिंह जी की इच्छा हुई कि - निर्भयरामजी महाराज का दर्शनकर के ही पर्वत पर चलेंगे ।
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इधर निर्भयरामजी महाराज को भी ज्ञात हुआ कि अलवर नरेश वक्तावर सिंह शिकार करने यहां हुये हैं । फिर अलवर नरेश वक्तावर सिंह निर्भयरामजी महाराज के दर्शन करने आये और दर्शन करके अति प्रसन्न हुये ।
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फिर जाने लगे तब निर्भयरामजी महाराज ने राजा को कहा - राजन् ! शिकार मारना अच्छा नहीं है, सभी प्राणियों में आत्मरुप से परमात्मा स्थित है । अत: सब पर दया ही करनी चाहिये कहा भी है -
दई योग ऐसो भयो, कोइ न मिली शिकार ।
हेरत राजा थक गयो, तरिषा लगी अपार ॥
(दौलतराम)
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फिर योगिराज निर्भयरामजी महाराज ने राजा को हिंसा से बचाने के लिये लीला रची । राजा के सामने मृग रुप में प्रकट हो गये । राजा ने मृग पर शस्त्र चलाया किन्तु शस्त्र लगते ही वह मृग गाय के रुप में बोलता हुआ पृथ्वी पर पडा । तब राजा अपने से गोहिंसा हुई समझकर भय से कांप गया और अपने मन में कहने लगा राजवंश को धिक्कार है ।
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कहा भी है -
सुने अहिंसक बात नहिं, तो ही पश्चात्ताप ।
अलवर नृप वक्तेश को, हुआ अधिक संताप ॥
राजा को अति दु:ख में देखकर वहां निर्भयरामजी महाराज प्रकट हो गये । उन्हें देखकर राजा अति लज्जित होकर अपने मन में सोचने लगा, मैंने महात्मा की शिक्षा नहीं मानी उसी का परिणाम यह महापाप मुझे हुआ है ।
(क्रमशः)

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