परमगुरु ब्रह्मर्षि श्री दादूदयाल जी महाराज की अनुभव वाणी

सोमवार, 22 दिसंबर 2025

रामबगसजी का त्याग

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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अथ अध्याय ९ 
११ आचार्य प्रेमदासजी ~ 
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आचार्य दिलेरामजी महाराज ने अपना उत्तराधिकारी वि. सं. १८९४ में ही अपने ज्येष्ठ शिष्य रामबगसजी को उनकी इच्छा नहीं होने पर भी बना कर पूजा बांट दी थी । अत: आचार्य दिलेरामजी के ब्रह्मलीन होने पर वि. सं. १८९७ फाल्गुण कृष्णा पंचमी को रामबगसजी को गद्दी पर बिठाया गया । 
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आपके टीका पर जयपुर नरेश सवाई रामसिंहजी ने घोडा, दुशाला और १००) रु. भेजे । अलवर नरेश ने हाथी, दुशाला, शिरोपाव, पार्चाथान(रेशमी थान) आदि भेजे । किशनगढ नरेश ने दुशाला भेजा । कोटा नरेश ने शिरोपाव, दुपट्टा और रोकडी रु. भेजे । डिग्गी ठाकुर मेघसिंह जी आदि अन्य छोटे बडे राजाओं ने तथा रईसों ने टीका की भेंट श्रद्धा पूर्वक भेजी । 
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किन्तु रामबगसजी तो विरक्त संत थे । उनको तो यह आने वाला धन अच्छा नहीं लग रहा था और न समुदाय में बैठना ही रुचिकर था । वे तो एकान्त में बैठकर भजन करने वाले संत थे । परन्तु गुरुजी की आज्ञा और समाज का आग्रह उनकी इच्छा नहीं होने पर भी उनको मानना ही पडा ।
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रामबगसजी का त्याग ~ गद्दी पर विराज करके भी वे इस वैभव संपन्न पद से विरक्त ही रहते थे । और इसको त्यागने का अवसर देख रहे थे । आप आचार्य गद्दी पर केवल १७ दिन ही विराजे । १८ वें दिन की रात्रि को आप भगवद् भजन करते हुये सोच रहे थे कि सब सो जायेंगे तो मैं यहां चैनरामजी की बारहदरी के पूर्वी झरोखे की दक्षिण की खिडकी से रस्सा डालकर उतर गये और दादूद्वारे से निकलकर जैसे पिंजरा खुला रहने पर सिंह निकल के वन को चला जाता है, वैसे ही आप चले गये । 
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परिचित लोगों से बचते हुये दूर देश में चले गये । फिर वहां एकान्त में रहकर ब्रह्म भजन करने लगे । यह भी सुनते हैं कि पूर्वाश्रम में नवलगढ के भक्त परिवार के थे । इनके पिता दादूजी के परम भक्त होने से इनको बचपन में ही आचार्य दिलेरामजी को भेंट कर दिया गया था । अत: बचपन से ही आप विरक्त थे । 
(क्रमशः) 

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