परमगुरु ब्रह्मर्षि श्री दादूदयाल जी महाराज की अनुभव वाणी

रविवार, 11 जनवरी 2026

*१५. मन कौ अंग ६८/७०*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१५. मन कौ अंग ६८/७०*

इंद्री अरु रवि शशि कला, घात मिलावै कोइ । 
सुन्दर तोलै जुगति सौं, तब मन पूरा होइ ॥६८॥
५ इन्द्रिय, १२ सूर्य, १ चन्द्र, १६ कला, ६ रस, रक्त आदि धातु - ये सब मिल कर ४० होते हैं । यदि इन सब के बल को मिलाकर देखा जाय तो हमारा मन इन सब के समग्र बल के समान ही तुल्यबलशाली है ॥६८॥
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चौपई
पांच सात नौ तेरह कहिये, साढे तीन अढाई लहिये । 
सब कौं जोर एक मन होई, मन के गायें सत्य नहिं कोई ॥६९॥
५, ७, ९, १३ इन सङ्ख्याओं के साथ(३ २/१) एवं(२ २/१) की सङ्ख्या मिला दी जायँ तो सब मिल कर ४०(चालीस) की सङ्ख्या हो जाती है । यह सङ्कलन ही एक मन कहलाता है । इस मन के अनुसार चलने से हम वस्तुतत्त्व को अधिगत नहीं कर सकते ॥६९॥
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ज्ञान कर्म इन्द्री दश जानहुं, मन ग्यारह का प्रेरक मानहुं । 
ग्यारह में जब एक मिटावै, सुन्दर तबहिं एकही पावै ॥७०॥
इति मन को अंग ॥१५॥
पाँच ज्ञानेन्द्रिय एवं पाँच कर्मेन्द्रिय मिला कर इन्द्रियों की सङ्ख्या दश (१०) जाननी चाहिये । इनमें मन भी मिला दिया जाय तो ये इन्द्रियाँ ११ (ग्यारह) हो जाती है । इन में ग्यारहवाँ मन इन दश इन्द्रियों का प्रेरक है ।
महात्मा श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - यदि इस(११ सङ्ख्या) में से एक ग्यारहवाँ मन हटा दिया जाय(निगृहीत कर लिया जाय तो एक ब्रह्म ही दिखायी देगा । (साधक को उसी एक ब्रह्म का साक्षात्कार होगा।) ॥७०॥ 
इति मन का अङ्ग सम्पन्न ॥१५॥
(क्रमशः) 

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