परमगुरु ब्रह्मर्षि श्री दादूदयाल जी महाराज की अनुभव वाणी

शनिवार, 17 जनवरी 2026

प्रायोपवेशन कर डालूँ

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*अति गति आतुर मिलन को,*
*जैसे जल बिन मीन ।*
*सो देखे दीदार को, दादू आतम लीन ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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कुछ दिनों के पश्चात् नरेन्द्र, राखाल, निरंजन, शरद, शशी, बाबूराम, योगीन, काली और लाटू वहीं रह गये, - वे फिर घर नहीं लौटे । क्रमशः प्रसन्न और सुबोध भी आकर रह गये । गंगाधर सदा मठ में आया-जाया करते थे । नरेन्द्र को बिना देखे वे रह न सकते थे ।
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बनारस के शिवमन्दिर में गाया जानेवाला 'जय शिव ओंकार' स्तोत्र उन्होंने मठ के भाइयों को सिखलाया था । मठ के भाई 'वाह गुरु की फतह' कहकर बीच-बीच में जो जयध्वनि करते थे, यह भी उन्हीं की सिखलायी हुई थी । तिब्बत से लौटने के पश्चात् वे मठ में ही रह गये । श्रीरामकृष्ण के और दो भक्त हरि तथा तुलसी सदा नरेन्द्र तथा मठ के दूसरे भाइयों को देखने के लिए आया करते थे । कुछ दिन बाद ये भी मठ में रह गये ।
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सुरेन्द्र ! तुम धन्य हो ! यह पहला मठ तुम्हारे ही हाथों से तैयार हुआ ! तुम्हारी ही पवित्र इच्छा से इस आश्रम का संगठन हुआ ! तुम्हें यन्त्रस्वरूप करके भगवान श्रीरामकृष्ण ने अपने मूलमन्त्र कामिनीकांचन-त्याग को मूर्तिमान कर लिया । कौमारकाल से ही वैराग्यव्रती शुद्धात्मा नरेन्द्रादि भक्तों द्वारा तुमने फिर से हिन्दू धर्म का प्रकाश मनुष्यों के सामने रखा ! भाई, तुम्हारा ऋण कौन भूल सकता है ?
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मठ के भाई मातृहीन बच्चों की तरह रहते थे - तुम्हारी प्रतीक्षा किया करते थे कि तुम कब आओगे । आज मकान का किराया चुकाने में सब रुपये खर्च हो गये हैं - आज भोजन के लिए कुछ भी नहीं बचा – कब तुम आओगे - कब तुम आओगे और आकर अपने भाइयों के भोजन का बन्दोबस्त कर दोगे ! तुम्हारे अकृत्रिम स्नेह की याद करके ऐसा कौन है जिसकी आँखों में आँसू न आ जाये !
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यह मठ श्रीरामकृष्ण के भक्तों में वराहनगर मठ के नाम से परिचित हुआ । वहीं श्रीठाकुर-मन्दिर में श्रीगुरुमहाराज भगवान श्रीरामकृष्ण की नित्यसेवा होने लगी । नरेन्द्र आदि सब भक्तों ने कहा, "अब हम लोग संसार-धर्म का पालन न करेंगे । श्रीगुरुमहाराज ने कामिनी और कांचन त्याग करने की आज्ञा दी थी, अतएव हम लोग अब किस तरह घर लौट सकते हैं ?"
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नित्यपूजन का भार शशी ने लिया । नरेन्द्र गुरु-भाइयों की देख-भाल किया करते थे । सब भाई भी उन्हीं का मुँह जोहते थे । नरेन्द्र उनसे कहते थे, "साधना करनी होगी, नहीं तो ईश्वर नहीं मिल सकते ।" वे और दूसरे गुरुभाई अनेक प्रकार की साधनाएँ करने लगे । वेद, पुराण, तन्त्र इत्यादी मतों के अनुसार अनेक प्रकार की साधनाओं में वे प्राणपण से लग गये ।
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कभी कभी एकान्त में वृक्ष के नीचे, कभी अकेले श्मशान में, कभी गंगा-तट पर साधना करते थे । मठ में कभी ध्यान करनेवाले कमरे के भीतर अकेले जप और ध्यान करते हुए दिन बिताने लगे । कभी कभी भाइयों के साथ एकत्र कीर्तन करते हुए नृत्य करते रहते । ईश्वर-प्राप्ति के लिए सब लोग, विशेषकर नरेन्द्र, बहुत ही व्याकुल हो गये । वे कभी कभी कहते थे, "उनकी प्राप्ति के लिए क्या मैं प्रायोपवेशन कर डालूँ ?"
(क्रमशः)

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