परमगुरु ब्रह्मर्षि श्री दादूदयाल जी महाराज की अनुभव वाणी

शुक्रवार, 2 जनवरी 2026

*१५. मन कौ अंग ३३/३६*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१५. मन कौ अंग ३३/३६*
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सुन्दर अरहट माल पुनि, चरखा बहुरि फिरात । 
धूंवा ज्यौं मन उठि चलै, कापै पकर्यौ जात ॥३३॥
महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - प्राणियों का मन लोक में उसी प्रकार घूमता रहता है जैसे अरहट या सूत कातने का चरखा चलता रहता है । आश्रयस्थान से निकलने के बाद इस को उसी प्रकार नियन्त्रित नहीं किया जा सकता, जैसे आकाश में पहुँचा हुआ अग्नि का धूंआ किसी की पकड़(नियन्त्रण) से बाहर हो जाता है ॥३३॥
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मन बसि करने कहत हैं, मन कै बसि ह्वै जांहि । 
सुन्दर उलटा पेच है, समझि नहीं घट मांहिं ॥३४॥
आज कल के पाषण्डी गुरु अपने शिष्यों को ऐसे मन पर निग्रह करने का उपदेश करते हैं; परन्तु स्वयं उसके वश में(अधीन) रहते हैं । यद्यपि देखने समझने में यह बात विपरीत सी लगती है; परन्तु यह उन(गुरुओं) का बुद्धिभ्रम(पेच) है; क्योंकि वे यथार्थ में ज्ञानी नहीं है ॥३४॥
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मन कौं मारत बैठि करि, मन मारै वै अंध । 
सुन्दर घोरे चढन को, घोरा बैठ्यौ कंध ॥३५॥
पाषण्डी शिष्य : ऐसे पाषण्डी गुरुओं द्वारा उपदिष्ट शिष्य अपने मन को नियन्त्रित करने हेतु आराधना आरम्भ करते हैं; परन्तु वे स्वयं उस मन के नियन्त्रण में हो जाते हैं । उन ने मन में कल्पना की घोड़े पर चढने की; परन्तु वह अनियन्त्रित घोड़ा उन पर ही चढ बैठता है ॥३५॥
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सुन्दर करत उपाइ बहु, मन नहिं आवै हाथ । 
कोई पीवै पवन कौं, कोई पीवै काथ ॥३६॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - ऐसे मिथ्योपदिष्ट शिष्य अपने मन को निगृहीत करने के अनेक उपाय करते हैं; परन्तु उन उपायों से उन का मन उनके अधीन नहीं हो पाता । उन में से कोई वायु पीकर ही अपने मन को वश में करना चाहता है, या कोई अन्य साधक, वैसा करने हेतु कुछ विशिष्ट औषधियों से बना क्वाथ(काढा) पीने लगता है ॥३६॥
(क्रमशः) 

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