परमगुरु ब्रह्मर्षि श्री दादूदयाल जी महाराज की अनुभव वाणी

रविवार, 18 जनवरी 2026

कुचामण गमन ~

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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आचार्यजी के स्थान पर सेवा की व्यवस्था पहले से ही अच्छी प्रकार कर दी गई थी । सेवक भी पास में रखने की व्यवस्था कर दी थी जिससे किसी संत को कोई आवश्यकता होती तो सेवक को सूचित कर देते थे । वह उसको पूरा कर देता था । उस दिन संपूर्ण जमात को रसोई बिसनदास जी ने ही दी । सायंकाल सबकी एक पंक्ति हुई थी । 
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उक्त प्रकार आज का दिन बहुत ही आनन्द के साथ व्यतीत हुआ । इस चातुर्मास में अनेक विद्वान संत पधारे थे । इस चातुर्मास का कार्यक्रम अन्य चातुर्मासों से विशेष तथा विलक्षण ही रहा था । भजन सत्संग दिन रात चौबीसों घंटे ही चलता रहता था । चित्त सत्संग में ही रमा रहता था । प्रात: दादूवाणी की कथा होती थी, उसके पश्‍चात् उपनिषद्, गीता, भागवत्, अध्यात्म रामायण आदि उच्चकोटि के अध्यात्म ग्रंथों के प्रवचन बारी-बारी से विद्वान संत करते रहते थे । एक के पश्‍चात् एक बैठकर श्रवण कराते थे । 
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प्रवचन बन्द होता तो नाम संकीर्तन व पदगायन गायक संतों द्वारा होता ही रहता था । आरती, अष्टक आदि स्तोत्र गायन होते ही रहते थे । रात्रि में जागरण होते ही रहते थे । उक्त प्रकार दिन रात चौबीसों घंटों ही भजन सत्संग चलता ही रहता था । साधु समुदाय अधिक होने से उक्त कार्यों में कुछ भी कठिनाई ज्ञात नहीं होती थी । बारी- बारी से संत लोग करते रहते थे और सुनने वाले संत तथा अन्य श्रोतागण सुनते रहते थे । 
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उक्त प्रकार इस चातुर्मास में भजन, संकीर्तन, प्रवचन, जागरण आदि की अन्य चातुर्मासों से बहुत ही अधिकता रही थी । इसके समान कोई चातुर्मास हुआ हो तो वह भी विलक्षण ही माना जा सकता है । किन्तु ऐसा अन्य चातुर्मास होना ज्ञात नहीं हो सका है । 
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चातुर्मास समाप्ति पर आचार्य जी को भेंट, महन्तों को भेंट तथा अन्य संतों की वस्त्रों की सेवा करके अति स्नेह से सबको विदा किया था । इस चातुर्मास में बिशनदासजी ने उस सस्ते जमाने में अति श्रद्धा भक्ति से चौसठ हजार रुपये खर्च करके अपनी उदारता का अच्छा परिचय दिया था ।
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कुचामण गमन ~ 
बिशनदासजी के चातुर्मास से विदा होकर मारवाड की रामत की । रामत के ग्रामों के स्थानधारी संत तथा भक्तों ने मंडल के सहित आचार्य उदयराम जी महाराज की अच्छी सेवा की । आचार्य जी भी सबको हितकर उपदेश देते हुये जनता को ईश्‍वर भक्ति में लगाने का प्रयत्न निरंतर करते रहते थे । 
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उक्त प्रकार भ्रमण करते हुये कुचामण नगर के पास आये तब कुचामण के सरदार शेरसिंहजी आचार्य जी को मंडल के सहित सत्कार पूर्वक कुचामण ले गये और सेवा तथा सत्संग भी श्रद्धा से किया । कुचामण की जनता ने भी मंडल सहित आचार्यजी की सेवा की तथा अति श्रद्धा से सत्संग भी किया । 
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दादूवाणी के प्रवचनों का कुचामण की धार्मिक जनता पर अच्छा प्रभाव पडा, कारण आचार्य उदयरामजी महाराज की समझाने की शैली भी अद्भुत थी । वे गंभीर से गंभीर विषय को अनायास ही अपनी युक्तियों से सर्व साधारण मानवों को भी समझा देते थे । कुछ दिन कुचामण की जनता को उपदेश देकर आचार्यजी वहां से जाने लगे तब मर्यादानुसार आचार्यजी को भेंट देकर सत्कार पूर्वक विदा किया ।  
(क्रमशः) 

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