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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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समारोह समाप्ति ~
उत्सव के आयोजन का स्थूल उद्देश्य ‘‘दादूजी महाराज की स्मृति को जागृत करना था ।’’ उसकी अधिकांश रुप में पूर्ति हो गई । यह वैसे ‘‘उत्सव’’ मनाया गया था । ‘‘उत्सवों’’ में जैसा कि उसका स्थूल रुप होना चाहिये, वैसा स्थूल रुप इसका भी बहुत अच्छे रुप में सम्पन्न हो गया । कथा, कीर्तन, जुलूस, भाषण, उपदेश के आवश्यक उपांग होते हैं, वे सब इसमें भी अच्छी प्रकार हुये थे ।
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जनता का समूह बहुत ही पर्याप्त था । बाहरी दृश्य भी बहुत अच्छा था । उत्सव के इस नाते से, समारोह की इस भावना से, शताब्दी उत्सव पूर्णरुप से सफल संपन्न हुआ, इसमें कोई अतिशयोक्ति का भाव नहीं है । इस प्रकार दादू समाज की निर्धारित भावना, परमाचार्य श्रीदादू महाराज की अनुकम्पा से सम्यक् रुप में सफलता के साथ सम्पन्न हो गई ।
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उत्सव मानकर आने वाले व्यक्तियों को किसी प्रकार का असंतोष नहीं रहा था । उत्सव की समाप्ति आनन्द के साथ ही हुई थी । उक्त महान् उत्सव आचार्य रामलालजी महाराज के समय में हुआ था । अत: उनके विवरण के साथ ही दिया गया है । उक्त प्रकार आचार्य रामलाल जी महाराज १२ वर्ष १० माह १३ दिन गद्दी पर विराज कर वि. सं. २००१ आश्विन कृष्णा ९ मी को ब्रह्मलीन हो गये ।
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गुण गाथा ~ दोहा-
रामलाल आचार्य जी, थे सब भांति प्रवीन ।
संकट में भी उन्हों का, हुआ न चित्त मलीन ॥१॥
होते भी प्रति पक्ष के, तजा न निज कर्तव्य ।
इसीलिये ही हो गये, वे सबके मन्तव्य ॥२॥
रामलालजी राम के, थे निश्चय ही लाल ।
इसी लिये ही हो सके, सब के पूज्य विशाल ॥३॥
रामलाल आचार्य ने, भजा विश्व पति राम ।
इससे ही उनके हुये, सारे पुरण काम ॥४॥
रामलाल आचार्य में, गुण थे उनहि समान ।
सब तो कैसे कह सके, ‘नारायण’ अनजान ॥५॥
इति श्री चतुर्दश अध्याय समाप्त: १४
(क्रमशः)

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