परमगुरु ब्रह्मर्षि श्री दादूदयाल जी महाराज की अनुभव वाणी

शनिवार, 13 जून 2026

२७. अक्षर बिचार कौ अंग ५/८

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२७. अक्षर बिचार कौ अंग ५/८ 
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उहै ऐंन उह गैंन है, नुकता ही कौ फेर । 
सुंदर नुकता भ्रम लग्यौ, ज्ञान सुपेदा हेर ॥५॥
यद्यपि अैन एवं गैंन - दोनों अक्षर आकृति में समान हैं; केवल गैंन में छोटा सा नुकता अधिक लगा हुआ है । अतः इस नुकते के कारण इन के विषय में द्वैत की भ्रान्ति होती है । इस भ्रान्ति(नुकता) को मिटाने के लिये जिज्ञासु को हरताल(अक्षर मिटाने का सफेद रंग रूपी) गुरुपदिष्ट ज्ञान की खोज करनी चाहिये ॥५॥
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ऐंन ऐंन के ऊपरैं, नुकता फूला होइ । 
ऐंन गैंन ह्वै जात है, ऐंन न सूझै कोइ ॥६॥
इस अैंन अक्षर के सीधे ऊपर लगा हुआ यह नुकता ऐसा प्रतीत होता है मानो किसी की आँखों में फूला(नेत्र रोग) हो गया हो । इस रोग के कारण, द्रष्टा(जिज्ञासु) को वह अैंन(आत्मा) ही गैंन(संसार) के रूप में भ्रमात्मक दिखायी देने लगता है ॥६॥
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नुकता फूला ऊपरै, सुन्दर अंजन लाइ । 
नुकता फूला दूरि ह्वै, ऐंन हि ऐंन दिखाइ ॥७॥
जैसे वह नेत्ररोगी किसी वैद्य के पास जा कर अपने फूला रोग के नाश के लिये कोई अंजन औषध लेकर उस से अपना वह रोग नष्ट कर लेता है; उसी प्रकार जिज्ञासु को अपना यह सांसारिक भ्रम मिटाने के लिये किसी समर्थ गुरु के पास जाकर उससे ज्ञानोपदेश ग्रहण करना चाहिये । तदनुरूप साधना करने पर ही जिज्ञासु को उस सर्वव्यापक आत्मा का साक्षात्कार हो पायगा ॥७॥ (क)
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ज्यौं आकार अक्षरनि मैं, त्यौं आतम सब मांहिं । 
सुन्दर एकै देखिये, भिन्न भाव कछु नांहिं ॥८॥
देवनागरी अक्षरों के माध्यम से आत्मतत्त्व पर विचार : जैसे देवनागरी लिपि के क, ख आदि सभी वणों में 'अ' अक्षर सम्पृक्त रहता है, वैसे ही सभी प्राणियों में आत्मा व्याप्त है । अतः साधक को सभी प्राणियों में समभाव रखना चाहिये; क्योंकि उनमें कोई भिन्नता नहीं है ॥८॥
(क्रमशः)

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