रविवार, 18 जनवरी 2026

*(२)नरेन्द्रादि भक्तों का शिवरात्रि व्रत*

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*दादू बूड रह्या रे बापुरे, माया गृह के कूप ।*
*मोह्या कनक अरु कामिनी,*
*नाना विधि के रूप ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(२)नरेन्द्रादि भक्तों का शिवरात्रि व्रत*
आज सोमवार है, २१ फरवरी १८८७ । नरेन्द्र और राखाल आदि ने आज शिवरात्रि का उपवास किया है । आज से दो दिन बाद श्रीरामकृष्ण की जन्मतिथि-पूजा होगी । नरेन्द्र और राखाल आदि भक्तों में इस समय तीव्र वैराग्य है । एक दिन राखाल के पिता राखाल को घर ले जाने के लिए आये थे ।
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राखाल ने कहा, "आप लोग कष्ट करके क्यों आते हैं ? मैं यहाँ बहुत अच्छी तरह हूँ । अब आशीर्वाद दीजिये कि आप लोग मुझे भूल जायँ और मैं भी आप लोगों को भूल जाऊँ ।" इस समय सब लोगों में तीव्र वैराग्य है । सारा समय साधन भजन में ही जाता है । सब का एक ही उद्देश्य है कि किस तरह ईश्वर के दर्शन हों ।
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नरेन्द्र आदि भक्तगण कभी जप और ध्यान करते हैं, कभी शास्त्रपाठ । नरेन्द्र कहते हैं "गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने जिस निष्काम कर्म का उल्लेख किया है, वह पूजा, जप, ध्यान - यही सब है, सांसारिक कर्म नहीं ।"
आज सबेरे नरेन्द्र कलकत्ता गये हुए हैं । घर के मुकदमे की पैरवी करनी पड़ती है । अदालत में गवाह पेश करने पड़ते हैं ।
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मास्टर सबेरे नौ बजे के लगभग मठ में आये । कमरे में प्रवेश करने पर उन्हें देखकर श्रीयुत तारक मारे आनन्द के शिव के सम्बन्ध में रचित एक गाना गाने लगे - "ता थैया ता थैया नाचे भोला ।"
उनके साथ राखाल भी गाने लगे और गाते हुए दोनों नाचने लगे ।
यह गाना नरेन्द्र को लिखे अभी कुछ ही समय हुआ है ।
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मठ के सब भाइयों ने व्रत किया है । कमरे में इस समय नरेन्द्र, राखाल, निरंजन, शरद, शशी, काली, बाबूराम, तारक, हरीश, सींती के गोपाल, सारदा और मास्टर हैं । योगीन और लाटू वृन्दावन में हैं । उन लोगों ने अभी मठ नहीं देखा ।
आगामी शनिवार को शरद, काली, निरंजन और सारदा पुरी जानेवाले हैं - श्रीजगन्नाथजी के दर्शन करने के लिए ।
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श्रीयुत शशी दिनरात श्रीरामकृष्ण की सेवा में रहते हैं ।
पूजा हो गयी । शरद तानपूरा लेकर गा रहे हैं - "शंकर शिव बम् बम् भोला, कैलासपति महाराज राज ।"
नरेन्द्र कलकत्ते से अभी ही लौटे हैं । अभी उन्होंने स्नान भी नहीं किया । काली नरेन्द्र से मुकदमे की बातें पूछने लगे ।
नरेन्द्र - (विरक्तिपूर्वक) - इन सब बातों से तुम्हें क्या काम ?
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नरेन्द्र मास्टर आदि से बातें कर रहे हैं । नरेन्द्र कह रहे हैं - "कामिनी और कांचन का त्याग जब तक न होगा, तब तक कुछ न होगा । कामिनी नरकस्य द्वारम् । जितने आदमी हैं, सब स्त्रियों के वश में हैं । शिव और कृष्ण की बात और है । शक्ति को शिव ने दासी बनाकर रखा था । श्रीकृष्ण ने संसार-धर्म का पालन तो किया था, परन्तु वे कैसे निर्लिप्त थे ! उन्होंने वृन्दावन कैसे एकदम छोड़ दिया !"
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राखाल - और द्वारका का भी उन्होंने कैसा त्याग किया !
गंगा-स्नान करके नरेन्द्र मठ लौटे । हाथ में भीगी धोती है और अँगौछा । सारदा ने आकर नरेन्द्र को साष्टांग प्रणाम किया । उन्होंने भी शिवरात्रि के उपलक्ष्य में उपवास किया है । अब वे गंगा-स्नान के लिए जानेवाले हैं । नरेन्द्र ने पूजा-घर में जाकर श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया और फिर आसन लगाकर कुछ समय तक ध्यान करते रहे ।
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भवनाथ की बातें हो रही हैं । भवनाथ ने विवाह किया है । इसलिए उन्हें नौकरी करनी पड़ती है ।
नरेन्द्र कह रहे हैं, 'वे तो सब संसारी कीट हैं ।'
दिन ढलने लगा । शिवरात्रि की पूजा के लिए व्यवस्था हो रही है । बेल की लकड़ी और बिल्वदल इकट्ठे किये गये । पूजा के बाद होम होगा ।
(क्रमशः)

*१६. चाणक को अंग २०/२२*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१६. चाणक को अंग २०/२२*
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मेल्है पाव उठाइ कै, बक ज्यौं मांडै ध्यान ।
बैठौ गटकै माछली, सुन्दर कैसौ ज्ञान ॥२०॥
कोई पाषण्डी साधु(लोगों को) अहिंसा धर्म पालन की दृढता दिखाने के लिये मार्ग में चलते समय अपने पैर भूमि पर इतना धीरे रखता है कि कोई चींटी आदि सुक्ष्म जन्तु भी पैर के नीचे आकर न मर जाय; और ध्यान समाधि का बगुले के समान दिखावा करता है । जब कि वह यथार्थ जीवन में परहिंसा हेतु निरन्तर तत्पर रहता है । श्रीसुन्दरदासजी पूछते हैं कि यह उस पाषण्डी का कैसा ध्यान है । उस पर कोई कैसे विश्वास करे ! ॥२०॥
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सुंदर जीव दया करै, न्यौता मानै नाहिं । 
माया छुवै न हाथ सौं, परकाला ले जाहिं ॥२१॥
कोई कोई पाषण्डी साधु किसी का भी निमन्त्रण इसलिये स्वीकार नहीं करते कि उस के कारण किस मत्स्य मृग आदि की हिंसा न हो । परन्तु ऐसे पाषण्डी अपने वास्तविक जीवन में ऐसे हिंसक या चौर होते हैं कि अवसर मिलने पर वे कहीं फटा पुराना चिथड़ा(वस्त्र) भी नहीं छोड़‌ते ॥२१॥
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भेख बनावै बहुत बिधि, जटा बधावैं सीस । 
माला पहिरै तिलक दे, सुंदर तजै न रीस ॥२२॥
अनेक पाषण्डी साधु अपने सिर पर बड़ी बड़ी जटा बढा लेते हैं, गले में लम्बी माला तथा मस्तक पर तिलक लगा लेते हैं; परन्तु वे दूसरों के प्रति क्रोध तथा ईर्ष्या नहीं त्याग सकते ॥२२॥
(क्रमशः) 

कुचामण गमन ~

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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आचार्यजी के स्थान पर सेवा की व्यवस्था पहले से ही अच्छी प्रकार कर दी गई थी । सेवक भी पास में रखने की व्यवस्था कर दी थी जिससे किसी संत को कोई आवश्यकता होती तो सेवक को सूचित कर देते थे । वह उसको पूरा कर देता था । उस दिन संपूर्ण जमात को रसोई बिसनदास जी ने ही दी । सायंकाल सबकी एक पंक्ति हुई थी । 
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उक्त प्रकार आज का दिन बहुत ही आनन्द के साथ व्यतीत हुआ । इस चातुर्मास में अनेक विद्वान संत पधारे थे । इस चातुर्मास का कार्यक्रम अन्य चातुर्मासों से विशेष तथा विलक्षण ही रहा था । भजन सत्संग दिन रात चौबीसों घंटे ही चलता रहता था । चित्त सत्संग में ही रमा रहता था । प्रात: दादूवाणी की कथा होती थी, उसके पश्‍चात् उपनिषद्, गीता, भागवत्, अध्यात्म रामायण आदि उच्चकोटि के अध्यात्म ग्रंथों के प्रवचन बारी-बारी से विद्वान संत करते रहते थे । एक के पश्‍चात् एक बैठकर श्रवण कराते थे । 
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प्रवचन बन्द होता तो नाम संकीर्तन व पदगायन गायक संतों द्वारा होता ही रहता था । आरती, अष्टक आदि स्तोत्र गायन होते ही रहते थे । रात्रि में जागरण होते ही रहते थे । उक्त प्रकार दिन रात चौबीसों घंटों ही भजन सत्संग चलता ही रहता था । साधु समुदाय अधिक होने से उक्त कार्यों में कुछ भी कठिनाई ज्ञात नहीं होती थी । बारी- बारी से संत लोग करते रहते थे और सुनने वाले संत तथा अन्य श्रोतागण सुनते रहते थे । 
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उक्त प्रकार इस चातुर्मास में भजन, संकीर्तन, प्रवचन, जागरण आदि की अन्य चातुर्मासों से बहुत ही अधिकता रही थी । इसके समान कोई चातुर्मास हुआ हो तो वह भी विलक्षण ही माना जा सकता है । किन्तु ऐसा अन्य चातुर्मास होना ज्ञात नहीं हो सका है । 
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चातुर्मास समाप्ति पर आचार्य जी को भेंट, महन्तों को भेंट तथा अन्य संतों की वस्त्रों की सेवा करके अति स्नेह से सबको विदा किया था । इस चातुर्मास में बिशनदासजी ने उस सस्ते जमाने में अति श्रद्धा भक्ति से चौसठ हजार रुपये खर्च करके अपनी उदारता का अच्छा परिचय दिया था ।
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कुचामण गमन ~ 
बिशनदासजी के चातुर्मास से विदा होकर मारवाड की रामत की । रामत के ग्रामों के स्थानधारी संत तथा भक्तों ने मंडल के सहित आचार्य उदयराम जी महाराज की अच्छी सेवा की । आचार्य जी भी सबको हितकर उपदेश देते हुये जनता को ईश्‍वर भक्ति में लगाने का प्रयत्न निरंतर करते रहते थे । 
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उक्त प्रकार भ्रमण करते हुये कुचामण नगर के पास आये तब कुचामण के सरदार शेरसिंहजी आचार्य जी को मंडल के सहित सत्कार पूर्वक कुचामण ले गये और सेवा तथा सत्संग भी श्रद्धा से किया । कुचामण की जनता ने भी मंडल सहित आचार्यजी की सेवा की तथा अति श्रद्धा से सत्संग भी किया । 
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दादूवाणी के प्रवचनों का कुचामण की धार्मिक जनता पर अच्छा प्रभाव पडा, कारण आचार्य उदयरामजी महाराज की समझाने की शैली भी अद्भुत थी । वे गंभीर से गंभीर विषय को अनायास ही अपनी युक्तियों से सर्व साधारण मानवों को भी समझा देते थे । कुछ दिन कुचामण की जनता को उपदेश देकर आचार्यजी वहां से जाने लगे तब मर्यादानुसार आचार्यजी को भेंट देकर सत्कार पूर्वक विदा किया ।  
(क्रमशः) 

*३. श्री गुरुदेव का अंग ~७३/७६*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३. श्री गुरुदेव का अंग ~७३/७६*
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षट् दर्शन सलित हुँ पड्यूं, आतम लोढी होय ।
सु गुरु राज मूरति गढे, सो वन्दे सब कोय ॥७३॥
जैसे नदियों में पत्थर पड़ जाता है, तब टक्करें खा खा कर लोढ़ी बन जाता है, किन्तु राज के हाथ में जाने से वह उसकी सुन्दर मूर्ति बना देता है, फिर उस मूर्ति को सब नमस्कार करते हैं । वैसे ही जोगी, जगम, सेवड़े, बौद्ध, सन्यासी, और शेख । इन ६ प्रकार के भेषधारियो में जाने से जीवात्मा घर, कुलादि से रहित तो हो जाता है । किन्तु गुरु की शरण जाने से गुरु उपदेश द्वारा उसे ब्रह्म ज्ञानी संत बना देते हैं, फिर उसे सभी वन्दना करते हैं ।
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देही१ दरिया माँहिं, गुरुदेव बसाई द्वारिका ।
और हुँ होय सु नाँहिं, ना कोई उन सारिखा ॥७४॥
जैसे श्रीकृष्ण ने समुद्र में द्वारिकापुरी बसाई थी । वैसे ही गुरुदेव ने जीवात्मा१ रूप समुद्र में ज्ञान-रूप द्वारिका बसाई है । यह कार्य अन्य से अच्छी प्रकार नहीं हो सकता । कारण - गुरु के समान इस कार्य में निपुण अन्य कोई भी नहीं है ।
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बाहर बैठे बहिमुर्ख, गुरुमुख भीतर जाय ।
रज्जब रीता क्यों पड़े, खोल खजाना खाय ॥७५॥
गुरु उपदेश से विमुख प्राणी ही तीर्थ व्रतादि बाह्य साधनो में स्थित हैं, किंतु गुरु उपदेश रूप आज्ञा में चलने वाले साधक अन्तमुर्ख वृत्ति द्वारा भीतर जाते हैं और अज्ञान कपाट को खोलकर ज्ञान-निधि के ब्रह्मानन्द पदार्थ का आस्वादन करते हैं । कहिये ऐसे साधको का अन्त:करण ब्रह्मानन्द से वंचित कैसे रह सकता है ?
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गुरु मुख बासा पिंड में, मन मुख ह्वै ब्रह्मंड ।
रज्जब भीतर भय नहीं, बाहर खंड हु खंड ॥७६॥
गुरु उपदेश रूप आज्ञा में रहने वाले साधकों की वृत्ति का निवास शरीर के भीतर अन्त:करण में रहता है और मनोनुकूल चलने वालों की वृत्ति ब्रह्मांड के विभिन्न पदार्थों पर जाती है । अन्तर्वृत्ति वालों को तो अद्धैतनिष्ठ होने से कोई प्रकार का भय नहीं होता, किन्तु बहिर्वृत्ति वालो की वृत्ति के पदार्थ भेद से नाना खंड होते रहते हैं, और भेद भय का कारण है, यह भी प्रसिद्ध है ।
(क्रमशः)

*३. श्री गुरुदेव का अंग ~६९/७२*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३. श्री गुरुदेव का अंग ~६९/७२*
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*रज्जब नीचे को ऊंचा करे, भगवत् भांडा फोड़ि ।*
*सो मध्यम उत्तम किये, सद्गुरु इहिं सु खोड़ि ॥६९॥*
ईश्वर यदि नीचे जीव को ऊंचा बनाते हैं, तो शरीर छूटने पर कर्मानुसार मनुष्य को देव बना देते हैं, किन्तु सद्गुरु तो वर्तमान शरीर में ही ज्ञानोपदेश द्वारा मध्यम प्राणी को भी उत्तम बना देते हैं ।
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*हुमा बावने पारस सद्गुरु, कृत करतहि अधिकार ।*
*जगदीश ईश ह्वै जन्म दूसरे, इन सौं अब की बार ॥७०॥*
१. हुमा नामक एक पक्षी होता है, जो केवल सूखी हड्डियाँ खाकर निर्वाह करता है, किसी को भी नहीं सताता । उसकी छाया जिस पर पड़ जाती है, वह दरिद्री होने पर भी वर्तमान जन्म में ही बादशाह बन जाता है ।
२. बावने चन्दन की सुगंधि से वन - वृक्ष चन्दन बन जाते हैं ।
३. पारस के स्पर्श से लोहा सुवर्ण बन जाता है ।
४. सद्गुरु के ज्ञानोपदेश से जीव वर्तमान शरीर में ही संत बन जाता है । हुमा, बावन, चन्दन, पारस और सद्गुरु को ईश्वर ने ही यह वर्तमान में परिवर्तन करना रूप कार्य का अधिकार दिया है ।
अत: इनसे ही यह कार्य होता है । ईश्वर किसी को राजा बनाते हैं या स्वर्ग में भेजते हैं, ते वर्तमान शरीर को छोड़ने पर ही बनते, भेजते हैं कारण - जिस प्रारब्ध कर्म से शरीर बना है उसे भोगने के पश्चात् ही वर्तमान शरीर में किये कर्म का फल नृपति शरीर दूसरे जन्म में ही मिलता है । हुमा की छाया का फल, पारस के स्पर्श का फल, चन्दन की सुगन्धि का फल भविष्य काल की अपेक्षा नहीं रखता, वैसे ही गुरुदेव के ज्ञानोपदेश का फल दूसरे जन्म की अपेक्षा नहीं रखता है । यही गुरुदेव की महिमा है ।
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*गुरु भृंगी के कृत्य१ को, कृत्य न पूजै२ कोय ।*
*रज्जब रचना राम की, ये ही पलटे दोय ॥७१॥*
गुरु और भृंगी के कार्य१ की समता२ किसी का भी कार्य नहीं कर सकता । राम साधारण मानव और कीट की रचना करते हैं, किन्तु गुरु साधारण मानव को अपने उपदेश द्वारा संत बना कर ब्रह्म से मिला देते हैं और भृंग कीट को भृंग बना देता है । ये दो ही राम की रचना को बदलते हैं, अन्य कोई भी नहीं बदल सकता ।
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*रज्जब प्राण पषाण जड़, गुरु गराब१ किये देव ।*
*पेखो पिंड पलटे प्रथम, सृष्टि सु लागी सेव ॥७२॥*
देखो, जो पषाण खण्ड प्रथम पैरों की ठोकरे खाता है, राज१ उसकी देव - मुर्ति बना देता है, फिर सब उसकी पूजा करते हैं । वैसे ही प्राणी प्रथम अज्ञानी होता है, फिर गुरु उपदेश द्वारा उसे संत बना देते हैं और सब संसार उसकी सेवा करता है ।
(क्रमशः)

शनिवार, 17 जनवरी 2026

*३. श्री गुरुदेव का अंग ~६५/६८*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३. श्री गुरुदेव का अंग ~६५/६८*
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*त्रिगुण रहित कूँची गुरु, ताला त्रिगुण शरीर ।*
*जन रज्जब जिव तो खुले, जे योग्य मिले गुरु पीर ॥६५॥*
कर्मजन्य त्रिगुणात्मा शरीर ही ताला है, उसमें जीव बन्ध हो रहा है । यदि भाग्यवश कोई गुरुपने की योग्यता से युक्त सिद्ध गुरु मिल जावे और कृपा करके अपना त्रिगुण रहित ज्ञान रूप कूँची लगाकर उक्त ताले को खोल दे तो जीवमुक्त हो जाता है ।
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*सदगुरु रहित सकल सौं, सब गुण रहिता बैन ।*
*रज्जब मानी साखि सो, उस वाइक१ में चैन ॥६६॥*
सदगुरु संपूर्ण विकारों से रहित होते हैं, उनके वचन भी त्रिगुण वा संपूर्ण दोष रूप गुणों से रहित होते हैं हमने भी उसी साक्षी को माना है, जो उन गुरुदेव ने कही है । उस अपने स्वरूप को बताने१ वाले गुरुदेव के वचनों में रहने से ही ब्रह्मानन्द प्राप्त होता है ।
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*गोपि१ गांठ गात मुर२, खोलें गुरु समरथ्थ ।*
*रज्जब इन बिन और का, तहाँ न पहुँचे हथ्थ ॥६७॥*
तीन१ गुणों की लगी हुई ग्रंथि शरीर में गुप्त२ रूप से स्थित है, जो समर्थ गुरु होते हैं वे ही उसे खोल पाते हैं । इन समर्थ गुरुओं के बिना अन्य का ज्ञान रूप हाथ उस ग्रन्थि के पास नहीं पहुँचता ।
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*रज्जब बँध्या ब्रह्म का, गुरुदेव छुडावे ।*
*औरों को यहु गम१ नहीं, कोइ बीच न आवे ॥६८॥*
कर्मानुसार ईश्वर द्वारा शरीर में बाँधे हुये जीव को, गुरु ही ज्ञानोपदेश से मुक्त करते हैं । अन्यों को यह विचार१ शक्ति प्राप्त नहीं होती अतः गुरुपने के लक्षणों रहित कोइ भी प्राणी साधकों के बीच गुरु रूप में नहीं आना चाहिए ।
(क्रमशः)

*३. श्री गुरुदेव का अंग ~६१/६४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३. श्री गुरुदेव का अंग ~६१/६४*
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*प्राण पिंड में सानिया१, पंच पचीसों घोलि२ ।*
*जन रज्जब गुरु ज्ञान बल, हरि हि मिलाये खोलि ॥६१॥*
माया विशिष्ट ने आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, इन पंच तत्त्वों -
*पृथ्वी की* - अस्थि, मेद, क्षुधा, रोध, भय ।
*जल की* - त्वक, मूत्र, तृषा, भ्रमण, मोह ।
*अग्नि की* - माँस, रक्त, आलस्य, ऊर्घ्वगमन, क्रोध ।
*वायु की* - नाड़ी, शुक्र, संगम, अतिनिर्गमन, काम ।
*आकाश की* - रोम, श्लेषम, निद्रा, उच्चस्थिति, लोभ ।
तथा इनकी २५ प्रकृतियों का पंचीकरण१ बनाकर शरीर की रचना द्वारा प्राणी को इनमें मिलाकर२ इनके राग से बाँध दिया है, यही चिज्जड़ ग्रंथी है । गुरुदेव ने ही इसको अपने ज्ञान बल से खोल कर हमें परब्रह्म से मिलाया है ।
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*जीव रच्या जगदीश ने, बाँध्या काया माँही ।*
*जन रज्जब मुक्ता किया, गुरु सम कोई नांहि ॥६२॥*
ईश्वर ने जीव को उत्पन्न किया किन्तु शरीर को राग में बाँध दिया, इससे वह दुखी ही रहा । फिर गुरुदेव ने ज्ञानोपदेश द्वारा राग के मूल कारण अज्ञान को नष्ट करके राग-बन्धन से मुक्त किया है और परब्रह्म से मिलाया है । अत: इस संसार में गुरु के समान जीव का सच्चा हितैषी कोई भी नहीं है ।
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अरिल -
*शक्ति सु:ख अरु शीत जमे हिम हि ज्यों ।*
*आतम अंड सु कूंज बंधे बपु वारि यों ॥*
*सद्गुरु सूरज तेज, विरह वैशाख रे ।*
*परि बहे नैन नद पूर१, मिल हिं सुत मात रे ॥६३॥*
जैसे अति शीत के कारण जल हिमालय पर बर्फ बन कर जम जाता है, उस पर कूंज पक्षी अंडा रखकर उष्ण प्रदेशों में आ जाता है । अंडे पर भारी हिम राशि जम जाती है । फिर वैशाख मास में सूर्य की तीक्ष्ण किरणों से बर्फ गल कर जल प्रवाह१ के रूप में नदियों द्वारा बह जाता है, अंडा निरावरण हो जाता है ।
उसी समय कूंज पक्षी वहाँ पहुंच जाता है और अंडा अपनी माता को प्राप्त कर लेता है । वैसे ही मायिक सुखार्थ बने हुए शरीर में ईश्वर आतम को रखकर, संसार व्यवस्था में संलग्न रहते हैं । आत्मा मायिक सुखों के राग और देहाध्यासादि अज्ञान से नीचे दब जाता है, तब दयालु गुरु उसे ईश्वर से मिलने की प्रेरणा करते हैं ।
उससे ईश्वर वियोग - व्यथा से वह रोता है तब विषय रागादि गलकर नेत्रों के द्वारा अश्रु रूप से बह जाते हैं, मन निर्मल और स्थिर हो जाता है फिर गुरदेव के द्वारा दिये गये ब्रह्मज्ञान से परब्रह्म को प्राप्त हो जाता है । इस अरिल में ब्रह्मात्मा के वियोग और संयोग दोनों ही की पद्धति बताई गई है ।
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*सकल कर्म ताला भये, जीव जड़्या ता माँहि ।*
*रज्जब गुरु कुँची बिना, कबहूँ खूटे नाँहि ॥६४॥*
जीव अपने किये हुये संपूर्ण कर्म रूप ताले में बन्द है गुरु ज्ञान रूप कूँची के बिना यह कभी भी नहीं खुल सकता ।
(क्रमशः)

यूथ-क्रम ~

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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यूथ-क्रम ~ 
सबसे आगे एक डंका नगाडा अश्‍व पर रखा गया । उसके पीछे चौपदार जी शोभा यात्रा की सूचना देने का काम करने वाले थे । उनके पीछे जंदूरों के ऊंट, उनके पीछे नौबतों के ऊंट, उनके पीछे तासा आदि बाजे । उनके पीछे ‘दादूराम’ की ध्वनि करने वाला साधु मंडल, उनके पीछे शस्त्र कला में निपुण खंडेत । 
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उनके पीछे गायक संतों का मंडल, उनके पीछे सजा हुआ हाथी । उसके पीछे महन्तों की सवारियां । उनके पीछे साधु मंडल चल रहा था । उन साधुओं की पंक्ति हंस पंक्ति के समान सर्वथा श्‍वेत भास रही थी । उनके शिरों पर श्‍वेत शिरपेच, गलों में श्‍वेत कु़डते, कटि में श्‍वेत कटि वस्त्र, हाथी में सुमिरनी और शेल, पैरों में अधिक के जूते और कुछ के खडाऊ थी । कंधों में तलवारें लटक रही थीं । 
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उक्त प्रकार यह विशाल यूथ पंक्तिबद्ध होकर अपने प्रिय आचार्य जी की अगवानी करने जा रहा था । शनै: शनै: जहां आचार्यजी थे, वहां उक्त संत मंडल जा पहुँचा । मर्यादा सहित महन्तों ने सत्यराम बोलकर भेंटें चढाकर दंडवतें की । आचार्यजी ने उनकी मर्यादा के अनुसार उन सब का सत्कार किया । सर्व साधारण साधु संतों ने दूर से ही सत्यराम बोलकर दंडवतें की । 
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फिर आचार्यजी को हाथी पर विराजमान कराके पूर्व क्रम के अनुसार शोभा यात्रा को नगर के मुख्य बाजार से नगर की जनता को आचार्य जी के दर्शन कराते हुये चले । साथ में खंडेत अपनी शस्त्र कला दिखाते हुये चल रहे थे । गायक संतों केप द गाते चले जा रहे थे । शेष संत मंडल दादूराम मंत्र की ध्वनि करता हुआ शनै: शनै: आचार्य जी के पीछे चल रहा था । 
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स्थान २ पर दादूदयालु महाराज की जय बोली जा रही थी । भक्त लोग बीच बीच में आचार्य जी पर पुष्प वर्षा कर रहे थे । श्रद्धा पूर्वक भेंट चढा रहे थे । उन भक्तों को साथ की साथ आचार्य जी के कर्मचारी प्रसाद देते जा रहे थे । आगे चलने वाले चौपदार जनता को शोभा यात्रा की सूचना देते जा रहे थे । जंबूरों की तुमुल ध्वनि होती जा रही थी । 
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उक्त प्रकार यह आचार्य जी की शोभा यात्रा नगर के नागरिकों के नागरिकों के आनन्द को बढाती हुई आगे बढ रही थी । नगर के ठाकुर ने आचार्य जी के आगे आकर अभिवादन किया और भेंटें चढाई । कर्मचारियों ने उनको प्रसाद दिया । 
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आचार्यजी हाथी पर विराजे हुये सबका अभिवादन स्वीकार करते हुये सब को अभय मुद्रा से आशीर्वाद देते जा रहे थे । उक्त समय जमात में जो संत रह गये थे वे भी जैसे विशाल समुद्र में चारों ओर से आकर नदियां मिलती हैं, वैसे मिलने लगे । इस समय सब संतों के और सेवकों के मन हर्ष से फूल रहे थे । 
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बारंबार दादूजी की और आचार्यजी की जय बोली जा रही थी । शनै: शनै: जमात से चलती हुई यह शोभा यात्रा आचार्यजी को ठहरने के लियेजो स्थान नियत किया हुआ था उस स्थान पर पहुँच गई और मर्यादा पूर्वक आचार्य जी को वहां ठहराया गया । प्रसाद बांटकर शोभा यात्रा समाप्त की । 
(क्रमशः) 

*१६. चाणक को अंग १७/१९*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१६. चाणक को अंग १७/१९*
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यंत्र मंत्र बहु बिधि करै, झाडा बूंटी देत । 
सुन्दर सब पाषंड है, अंति पडै सिर रेत ॥१७॥
ऐसे ही अन्य कुछ पाषण्डी साधु जनता को, उन की मनोवाञ्छा पूर्ण करने के लिये, विविध मन्त्र, मन्त्र, झाड़-फूंक, या कोई विशिष्ट जड़ी – बूंटी देते रहते हैं । महात्मा सुन्दरदासजी कहते हैं - ऐसे साधुओं का यह सब कृत्य केवल पाषण्ड है । ऐसे कुकर्मों से वैसे साधुओं को समाज में अपमानित ही होना पड़ता है ॥१७॥
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कोऊ होत रसाइनी, बात बनावै आइ ।
सुन्दर घर मैं होइ कछु, सो सब ठगि ले जाइ ॥१८॥ 
ऐसे ही कोई रसायन विद्या का ज्ञाता ठग किसी भले घर में आ कर, वहाँ मीठी मीठी बातें बनाता हुआ सोना बनाने के नाम पर सब कुछ धन लूट ले जाता है ॥१८॥
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गल मैं पहरी गूदरी, कियौ सिंह कौ भेख । 
सुन्दर देखत भय भयौ, बोलत जान्यौ मेख ॥१९॥
कोई पाषण्डी साधु लोगों को ठगने के लिये अपना त्याग दिखाने हेतु फटी पुरानी गूदड़ी ओढे रहता है, कोई व्याघ्रचर्म पहनकर ऐसा लगता है कि आदमी देखते ही भय से कांप उठे; परन्तु उस साधु के द्वारा यांचायुक्त दो शब्द बोलते ही उसका पाषण्ड लोगों के सम्मुख स्पष्ट हो जाता है और वह उनको भेड़ के समान लगने लगता है ॥१९॥
(क्रमशः)

प्रायोपवेशन कर डालूँ

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*अति गति आतुर मिलन को,*
*जैसे जल बिन मीन ।*
*सो देखे दीदार को, दादू आतम लीन ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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कुछ दिनों के पश्चात् नरेन्द्र, राखाल, निरंजन, शरद, शशी, बाबूराम, योगीन, काली और लाटू वहीं रह गये, - वे फिर घर नहीं लौटे । क्रमशः प्रसन्न और सुबोध भी आकर रह गये । गंगाधर सदा मठ में आया-जाया करते थे । नरेन्द्र को बिना देखे वे रह न सकते थे ।
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बनारस के शिवमन्दिर में गाया जानेवाला 'जय शिव ओंकार' स्तोत्र उन्होंने मठ के भाइयों को सिखलाया था । मठ के भाई 'वाह गुरु की फतह' कहकर बीच-बीच में जो जयध्वनि करते थे, यह भी उन्हीं की सिखलायी हुई थी । तिब्बत से लौटने के पश्चात् वे मठ में ही रह गये । श्रीरामकृष्ण के और दो भक्त हरि तथा तुलसी सदा नरेन्द्र तथा मठ के दूसरे भाइयों को देखने के लिए आया करते थे । कुछ दिन बाद ये भी मठ में रह गये ।
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सुरेन्द्र ! तुम धन्य हो ! यह पहला मठ तुम्हारे ही हाथों से तैयार हुआ ! तुम्हारी ही पवित्र इच्छा से इस आश्रम का संगठन हुआ ! तुम्हें यन्त्रस्वरूप करके भगवान श्रीरामकृष्ण ने अपने मूलमन्त्र कामिनीकांचन-त्याग को मूर्तिमान कर लिया । कौमारकाल से ही वैराग्यव्रती शुद्धात्मा नरेन्द्रादि भक्तों द्वारा तुमने फिर से हिन्दू धर्म का प्रकाश मनुष्यों के सामने रखा ! भाई, तुम्हारा ऋण कौन भूल सकता है ?
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मठ के भाई मातृहीन बच्चों की तरह रहते थे - तुम्हारी प्रतीक्षा किया करते थे कि तुम कब आओगे । आज मकान का किराया चुकाने में सब रुपये खर्च हो गये हैं - आज भोजन के लिए कुछ भी नहीं बचा – कब तुम आओगे - कब तुम आओगे और आकर अपने भाइयों के भोजन का बन्दोबस्त कर दोगे ! तुम्हारे अकृत्रिम स्नेह की याद करके ऐसा कौन है जिसकी आँखों में आँसू न आ जाये !
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यह मठ श्रीरामकृष्ण के भक्तों में वराहनगर मठ के नाम से परिचित हुआ । वहीं श्रीठाकुर-मन्दिर में श्रीगुरुमहाराज भगवान श्रीरामकृष्ण की नित्यसेवा होने लगी । नरेन्द्र आदि सब भक्तों ने कहा, "अब हम लोग संसार-धर्म का पालन न करेंगे । श्रीगुरुमहाराज ने कामिनी और कांचन त्याग करने की आज्ञा दी थी, अतएव हम लोग अब किस तरह घर लौट सकते हैं ?"
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नित्यपूजन का भार शशी ने लिया । नरेन्द्र गुरु-भाइयों की देख-भाल किया करते थे । सब भाई भी उन्हीं का मुँह जोहते थे । नरेन्द्र उनसे कहते थे, "साधना करनी होगी, नहीं तो ईश्वर नहीं मिल सकते ।" वे और दूसरे गुरुभाई अनेक प्रकार की साधनाएँ करने लगे । वेद, पुराण, तन्त्र इत्यादी मतों के अनुसार अनेक प्रकार की साधनाओं में वे प्राणपण से लग गये ।
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कभी कभी एकान्त में वृक्ष के नीचे, कभी अकेले श्मशान में, कभी गंगा-तट पर साधना करते थे । मठ में कभी ध्यान करनेवाले कमरे के भीतर अकेले जप और ध्यान करते हुए दिन बिताने लगे । कभी कभी भाइयों के साथ एकत्र कीर्तन करते हुए नृत्य करते रहते । ईश्वर-प्राप्ति के लिए सब लोग, विशेषकर नरेन्द्र, बहुत ही व्याकुल हो गये । वे कभी कभी कहते थे, "उनकी प्राप्ति के लिए क्या मैं प्रायोपवेशन कर डालूँ ?"
(क्रमशः)

शुक्रवार, 16 जनवरी 2026

पहला श्रीरामकृष्ण मठ

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*तिस घरि जाना वे, जहाँ वे अकल स्वरूप,*
*सोइ इब ध्याइये रे, सब देवन का भूप ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(ग)परिच्छेद १, श्रीरामकृष्ण की महासमाधि के पश्चात्*
*(१)पहला श्रीरामकृष्ण मठ*
रविवार, १५ अगस्त १८८६ ई. को श्रीरामकृष्ण, भक्तों को दुःख के असीम समुद्र में बहाकर स्वधाम को चले गये । अविवाहित और विवाहित भक्तगण श्रीरामकृष्ण की सेवा करते समय आपस में जिस स्नेह-सूत्र में बँध गये थे, वह कभी छिन्न होने का न था । एकाएक कर्णधार को न देखकर आरोहियों को भय हो गया है । वे एक दूसरे का मुँह ताक रहे हैं ।
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इस समय उनकी ऐसी अवस्था है कि बिना एक दूसरे को देखे उन्हें चैन नहीं - मानो उनके प्राण निकल रहे हो । दूसरों से वार्तालाप करने को जी नहीं चाहता । सब के सब सोचते हैं - 'क्या अब उनके दर्शन न होंगे ? वे तो कह गये हैं कि व्याकुल होकर पुकारने पर, हृदय की पुकार सुनकर ईश्वर अवश्य दर्शन देंगे ! वे कह गये हैं - आन्तरिकता होने पर ईश्वर अवश्य सुनेंगे ।'
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जब वे लोग एकान्त में रहते हैं, तब उसी आनन्दमयी मूर्ति की याद आती है । रास्ता चलते हुए भी उन्हीं की स्मृति बनी रहती है; अकेले रोते फिरते हैं । श्रीरामकृष्ण ने शायद इसीलिए मास्टर से कहा था, 'तुम लोग रास्ते में रोते फिरोगे । इसीलिए मुझे शरीर-त्याग करते हुए कष्ट हो रहा है ।'
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कोई सोचते हैं, 'वे तो चले गये और मैं अभी भी बचा हुआ हूँ ! इस अनित्य संसार में अब भी रहने की इच्छा ! मैं अगर चाहूँ तो शरीर का त्याग कर सकता हूँ, परन्तु करता कहाँ हूँ !' किशोर भक्तों ने काशीपुर के बगीचे में रहकर दिनरात उनकी सेवा की थी । उनकी महासमाधि के पश्चात्, इच्छा न होते हुए भी, लगभग सब के सब अपने अपने घर चले गये ।
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उनमें से किसी ने भी अभी संन्यासी का बाहरी चिह्न(गेरुआ वस्त्र आदि) धारण नहीं किया है । वे लोग श्रीरामकृष्ण के तिरोभाव के बाद कुछ दिनों तक दत्त, घोष, चक्रवर्ती, गांगुली आदि उपाधियों द्वारा लोगों को अपना परिचय देते रहे; परन्तु उन्हें श्रीरामकृष्ण हृदय से त्यागी कर गये थे ।
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लाटू, तारक और बूढ़े गोपाल के लिए कोई स्थान न था जहाँ वे वापस जाते । उनसे सुरेन्द्र ने कहा, "भाइयों, तुम लोग अब कहाँ जाओगे ? आओ, एक मकान लिया जाय । वहाँ तुम लोग श्रीरामकृष्ण की गद्दी लेकर रहोगे तो हम लोग भी कभी-कभी हृदय की दाह मिटाने के लिए वहाँ आ जाया करेंगे, अन्यथा संसार में इस तरह दिन-रात कैसे रहा जायगा ? तुम लोग वहीं जाकर रहो ।
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मैं काशीपुर के बगीचे में श्रीरामकृष्ण की सेवा के लिए जो कुछ दिया करता था, वह अभी भी दूँगा । इस समय उतने से ही रहने और भोजन आदि का खर्च चलाया जायगा ।" पहले-पहले दो-एक महीने तक सुरेन्द्र तीस रुपये महीना देते गये । क्रमशः मठ में दूसरे दूसरे भाई ज्यो ज्यों आकर रहने लगे, त्यों त्यों पचास-साठ रुपये का माहवार खर्च हो गया - सुरेन्द्र देते भी गये ।
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अन्त में सौ रुपये तक का खर्च हो गया । वराहनगर में जो मकान लिया गया था, उसका किराया और टैक्स दोनों मिलाकर ग्यारह रुपये पड़ते थे । रसोइये को छः रुपये महीना और बाकी खर्च भोजन आदि का था । बूढ़े गोपाल, लाटू और तारक के घर था ही नहीं । छोटे गोपाल काशीपुर के बगीचे से श्रीरामकृष्ण की गद्दी और कुल सामान लेकर उसी किराये के मकान में चले आये ।
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काशीपुर में जो रसोइया था, उसे यहाँ भी लगाया गया । शरद रात को आकर रहते थे । तारक वृन्दावन गये हुये थे, कुछ दिनों में वे भी आ गये । नरेन्द्र, शरद, शशी, बाबूराम, निरंजन, काली ये लोग पहले-पहल घर से कभी कभी आया करते थे । राखाल, लाटू, योगीन और काली ठीक उसी समय वृन्दावन गये हुये थे । काली एक महीने के अन्दर, राखाल कई महीने के बाद और योगीन पूरे साल भर बाद लौटे ।
(क्रमशः)

*१६. चाणक को अंग १३/१६*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१६. चाणक को अंग १३/१६*
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एक लेत हैं ठौर ही, सुन्दर बैठि अहार । 
दाख छुहारी राइता, भोजन बिबिध प्रकार ॥१३॥
कोई साधक एक स्थान पर बैठने का अभिनय करते हुए वहीं सदा भोजन करने का नियम कर लेते हैं । वे वहाँ बैठे ही बैठे नित्य नये प्रकार का भोजन ग्रहण करते हुए दाख, छुहारा मिला हुआ रायता(दही से बना खट्टा, मीठा भोज्य पदार्थ) खाते पीते रहते हैं ॥१३॥
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कोउक आचारी भये, पाक करै मुख मूंदि । 
सुन्दर या हुन्नर बिना, खाइ सकै नहिं खूंदि ॥१४॥
कुछ साधक ऐसे आचारवान् बन जाते हैं कि वे मुख मूंद(पट्टी बांध) कर भोजन बनाते हैं; क्योंकि वे इस अभिनय के बिना नित्य नये नये ताजा भोज्य पदार्थ नहीं पा सकते ॥१४॥
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कोउक माया देत है, तेरै भरै भंडार । 
सुन्दर आप कलाप करि, निठि निठि जुरै अहार ॥१५॥
कोई साधक अपने धनी शिष्यों को यही आशीर्वाद देते रहते हैं कि तुम्हारे भण्डार धन से भरे रहें; जब कि वे स्वयं प्रतिदिन उनका सविनय आदर करते हुए उनसे कुछ न कुछ मांगते रहते हैं ॥१५॥
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कोउक दूध रु पूत दे, कर पर मेल्हि बिभूति । 
सुन्दर ये पाषंड किय, क्यौं ही परै न सूति ॥१६॥ 
कोई पाषण्डी साधु अपने शिष्यों को "दूधों नहाओ, पूतों फलो" का आशीर्वाद देते हुए उन को विभूति(भस्म) का प्रसाद देते हैं । इतना पाषण्ड करने पर भी उन में से कुछ का जीवननिर्वाह सफलतापूर्वक नहीं हो पाता ॥१६॥
(क्रमशः)

बीकानेर से टीका की भेंट ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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बीकानेर से टीका की भेंट ~ 
वि. सं. १९१८ में ही बीकानेर नरेश की ओर से- घोडा, चान्दी की छडी, दुशाला आदि टीका का दस्तूर तथा नरेश की ओर से आचार्य जी के नाम सम्मान सूचक पत्र आया । आचार्यजी ने भेंट स्वीकार करके नारायणा दादूधाम दादूद्वारे का प्रसाद बीकानेर नरेश को भेज दिया ।
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विसनदासजी के चातुर्मास ~ 
वि. सं. १९१९ में विसनदासजी उदयपुर जमात वालों का चातुर्मास निश्‍चित हुआ । विसनदासजी ने नारायणा दादूधाम के मेले में महाराज उदयरामजी का चातुर्मास मनाकर सब जमातों के महन्त संतों को भी चातुर्मास का निमंत्रण प्रेम सहित दिया और अपने स्थान में जाकर चातुर्मास के लिये बहुत अच्छी तैयारी की । 
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आचार्य उदयरामजी महाराज का सामेला आषाढ शुक्ला नौमी का निश्‍चय किया गया । आचार्य जी तथा सब महन्त संतों को या सूचना दी गई । अन्य महन्त संतों के पत्रों में यह भी प्रार्थना लिखी गई कि आप लोग आषाढ शुक्ला ७-८ को ही उदयपुर जमात में पधारने की कृपा करें जिससे आचार्य जी का सामेला हम सब मिलकर कर सकें । 
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प्रार्थनानुसार महन्त संत नियत समय पर पधार गये । महन्तों के सामेले करके उनको नियत स्थानों पर ठहराया गया । इधर आचार्यजी भी आ गये । उनको उदयपुर नगर से परे ही ठहराया गया । आषाढ शुक्ला ९ मी को प्रात: ही उदयपुर जमात ने तथा आगत महन्त संतों ने आचार्य जी के सामेला की तैयारी की, हाथी को सजाया गया, निशान, नौबत, नगाडे ऊंटों पर जंबूरे रखे गये । 
शस्त्र कला में निगुण नागे जिनको खंडेत कहा जाता था । वे हनुमान जी के समान कच्छा पहनकर अपने अपने प्रदर्शन के शस्त्र लेकर तैयार हो गये । अन्य नागे संतों ने अपने अपने कंधों में तलवारें लटकाईं । एक हाथ में श्‍वेत चंदन की बनी हुई सुमिरनिये और दूसरे हाथ में भाले उठाये । विरक्त संतों ने एक हाथ में कमंडल और दूसरे हाथ में दंड लिये । गायक संतों ने अपने वाद्य लिये । इस प्रकार सबने तैयारी कर ली तब इस यूथ को क्रमबद्ध बनाया गया । 
(क्रमशः)

बुधवार, 14 जनवरी 2026

*ॐ नमो भगवते रामकृष्णाय*

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*शरण तुम्हारी केशवा, मैं अनन्त सुख पाया ।*
*भाग बड़े तूँ भेटिया, हौं चरणौं आया ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*ॐ नमो भगवते रामकृष्णाय*
(१)
आचण्डालाप्रतिहतरयो यस्य प्रेमप्रवाहः 
लोकातीतोऽप्यहह न जहौ लोककल्याणमार्गम् ।
त्रैलोक्येऽप्यप्रतिममहिमा जानकीप्राणबन्धः 
भक्त्या ज्ञानं वृतवरवपुः सीतया यो हि रामः ॥
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(२)
स्तब्धीकृत्य प्रलयकलितम्वाहवोत्थं महान्तम् 
हित्वा रात्रिं प्रकृतिसहजामन्धतामिस्रमिश्राम् ॥ 
गीतं शान्तं मधुरमपि यः सिंहनादं जगर्ज । 
सोऽयं जातः प्रथितपुरुषो रामकृष्णस्त्विदानीम् ॥
और एक स्तोत्र बेलुर मठ में तथा वाराणसी, मद्रास, ढाका आदि सभी मठों में आरती के समय गाया जाता है ।
.
इस स्तोत्र में स्वामीजी कह रहे हैं - "हे दीनबन्धो, तुम सगुण हो, फिर त्रिगुणों के परे हो, रातदिन तुम्हारे चरणकमलों की आराधना नहीं कर रहा हूँ इसीलिए मैं तुम्हारी शरण में आया हूँ । मैं मुख से आराधना कर रहा हूँ, ज्ञान का अनुशीलन कर रहा हूँ, परन्तु कुछ भी धारणा करने में असमर्थ हूँ इसीलिए तुम्हारी शरण में आया हूँ । 
तुम्हारे चरणकमलों का चिन्तन करने से मृत्यु पर विजय प्राप्त होती है, इसीलिए मैं तुम्हारी शरण में आया हूँ । हे दीनबन्धो, तुम ही जगत् की एकमात्र प्राप्त करने योग्य वस्तु हो, मैं तुम्हारी शरण में आया हूँ । 'त्वमेव शरणं मम दीनबन्धो !' "
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ॐ ह्री ऋतं त्वमचलो गुणजित् गुणेड्यः 
नक्तन्दिवं सकरुणं तव पादपद्मम् । 
मोहंकषं बहुकृतं न भजे यतोऽहम् 
तस्मात्त्वमेव शरणं मम दीनबन्धो ॥१॥
भक्तिर्भगश्च भजनं भवभेदकारि 
गच्छन्त्यलं सुविपुलं गमनाय तत्त्वम् । 
वक्त्रोद्धृतन्तु हृदि मे न च भाति किंचित् 
तस्मात्त्वमेव शरणं मम दीनबन्धो ॥२॥
तेजस्तरन्ति तरसा त्वयि तृप्तृष्णाः 
रागे कृते ऋतपथे त्वयि रामकृष्णे । 
मर्त्यामृतं तव पदं मरणोर्मिनाशम् 
तस्मात्त्वमेव शरणं मम दीनबन्धो ॥३॥ 
कृत्यं करोति कलुषं कुहकान्तकारि 
ष्णान्तं शिवं सुविमलं तव नाम नाथ । 
यस्मादहं त्वशरणो जगदेकगम्य
तस्मात्त्वमेव शरणं मम दीनबन्धो ॥४॥
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स्वामीजी ने आरती के बाद श्रीरामकृष्ण-प्रणाम सिखाया है । उसमें श्री रामकृष्णदेव को अवतारों में श्रेष्ठ कहा गया है ।
"स्थापकाय च धर्मस्य सर्वधर्मस्वरूपिणे । 
अवतारवरिष्ठाय रामकृष्णाय ते नमः ॥
(क्रमशः) 

*१६. चाणक को अंग ९/१२*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१६. चाणक को अंग ९/१२*
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बैठ्यौ आसन मारि करि, पकरि रह्यौ मुख मौंन । 
सुन्दर सैन बतावतें, सिद्ध भयौ कहि कौंन ॥९॥
केवल सिद्धासन लगाकर बैठने से, अथवा मौन व्रत रखने से या हाथ या आंख आदि के सङ्केत द्वारा बात करने से कोई आज तक सिद्ध हुआ है कि तूं ही हो जायगा ! ॥९॥
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कोउ करै पय पान कौं, कौंन सिद्धि कहि बीर । 
सुन्दर बालक बाछरा, ये नित पीवहिं खीर ॥१०॥
कोई, समस्त जीवनपर्यन्त, केवल दुग्धाहार करता रहे तो क्या उसे सिद्धि मिल जायगी ! अरे भाई ! तब तो ये दुधमुंहे शिशु या गौ के बछड़े सभी सिद्ध कहलाने लगेंगे; क्योंकि ये भी नित्य केवल दूध ही पीते हैं ॥१०॥
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कोऊ होत अलौनिया, खांहि अलौंनौ नाज । 
सुन्दर करहिं प्रपंच बहु, मान बढावण काज ॥११॥
कोई तथाकथित साधक लवण(नमक) का त्याग कर जीवनपर्यन्त अलोना(लवणरहित) अन्न खाते हैं, परन्तु स्वसम्मानवृद्धयर्थ अन्य समस्त जगत्प्रपञ्च करते रहते हैं ॥११॥
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धोवन पीवै बावरे, फांसू बिहरन जांहिं । 
सुन्दर रहै मलीन अति, समंझ नहीं घट मांहिं ॥१२॥
कुछ अन्य मूर्ख साधक चावल का धोवन पी कर शरीर - निर्वाह करते हैं, तथा कुछ साधक काँटों पर सोते हैं, कोई जीवनपर्यन्त स्नान न करते हुए अतिशय मलिन रहते हैं; क्योंकि ऐसे साधकों ने किसी सच्चे गुरु से साधना का उपदेश ग्रहण किया हो नहीं ॥१२॥
(क्रमशः) 

राजगढ का स्थान ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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राजगढ का स्थान ~ 
अलवर राज्य के राजगढ नगर में नारायणा के आचार्यों का स्थान तो आचार्य निर्भयरामजी महाराज के समय से ही था किन्तु छोटा था । आचार्य उदयरामजी महाराज ने उसको विशाल बना दिया । कारण जब आचार्य जी राजगढ जाते थे तब वह पहले वाला छोटा स्थान कम पडता था । 
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शिष्य संत मंडल आचार्यों के साथ बहुत रहता था । अलवर नरेशों की श्रद्धा भक्ति के कारण आचार्य राजगढ में बहुत आते जाते थे । अत: उदयरामजी महाराज ने स्थान संबन्धी कमी को पूर्ण कर दिया । वह स्थान अद्यापि अच्छी स्थिति से विद्यमान है ।  
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खेमदासजी के चातुर्मास ~ 
वि. सं. १९१७ में खेमदासजी अलवर वालों ने आचार्य उदयरामजी महाराज का चातुर्मास मनाया था और नारायणा दादूधाम दादूद्वारे में ही बैठा चातुर्मास करवाया था । यह चातुर्मास भी अच्छा रहा । किसी भी प्रकार की असुविधा नहीं रही । साधन सामग्री तो स्थान में सब थी ही । 
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सब संतों को भी अपनी- अपनी कुटिया की सुविधा थी ही । आने जाने के कष्ट से बचे थे । भोजन के समय बारह मास के समान पंक्ति में जाना होता ही था । सत्संग आरती में भी सदा की भांति ही जाना होता था । विशेष कार्य एक जागरण था सो जागरण होता तब जागरण में चले जाते थे । शेष समय में अपने- अपने आसन पर भजन करते थे । 
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चातुर्मास का सब प्रकार से प्रबन्ध दादूद्वारे के कर्मचारी ही करते थे । खेमदासजी ने तो केवल जो खर्च हुआ वह और आचार्यजी की भेंट तथा संतों के वस्त्रों के रुपये लगे सो दे दिये थे । उक्त प्रकार यह बैठा चातुर्मास आनन्द पूर्वक संपन्न हुआ था । 
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जयसिंह पुरा चातुर्मास ~ 
वि. सं. १९१८ में जयसिंह पुरा का चातुर्मास निश्‍चित हुआ था । इससे आचार्य उदयरामजी महाराज शिष्य संत मंडल के सहित चातुर्मास करने के लिये समय पर जयसिंह पुरा पधारे । वहां पर मर्यादानुसार आचार्य जी की अगवानी करके नियत स्थान पर ले जाकर ठहराया । 
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चातुर्मास का कार्यक्रम सत्संग आदि आरंभ हो गया । चातुर्मास के सब कार्यक्रम विधि विधान से होते रहे । चातुर्मास समाप्त होने पर आचार्य जी को मर्यादानुसार भेंट दी तथा सब संतों को यथोचित वस्त्रादि देकर सस्नेह सबको विदा किया ।
(क्रमशः)

*३. श्री गुरुदेव का अंग ~५७/६०*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३. श्री गुरुदेव का अंग ~५७/६०*
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*रज्जब बपु बनराय विधि, मधि मन मधु सम सान ।*
*बलिहारी गुरु मक्षिका, यहु छानी१ गति२ छान३ ॥५७॥*
जिस प्रकार वन पंक्ति के पुष्पों में शहद छिपा रहता है, वैसे ही शरीराध्यास में मन रहता है । जैसे शहद को मधु मक्षिका निकाल लाती है वैसे ही गुरु मन को निकाल लाते हैं, यह जो मन की छिपी१ हुई स्थिति२ है उससे भी मन को गुरु निकाल३ लाते हैं, अत: मैं गुरुदेव की बलिहारी जाता हूँ ।
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*माया पानी दूध मन, मिले सुमुहकम१ बंधि२ ।*
*जन रज्जब बलि हंस गुरु, सोधि लहीसो संधि ॥५८॥*
जैसे जल और दूध दृढ़१ संबंध२ से मिले रहते हैं तो भी उनको हंस अलग कर देता है । वैसे ही माया और मन दृढ़ संबंध से मिले रहते हैं, तो भी माया और मन की राग रूपी संधि को खोज के गुरु अपने उपदेश के द्वारा माया को मिथ्या बता कर मन को माया से अलग कर देते हैं, अत: मैं गुरुदेव की बलहारी होता हूँ ।
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*अर्क अंभ को नाश कर, स्वाद रंगतैं काढ़ ।*
*रज्जब रचना हंस की, क्षीर नीर पर बाढ़ ॥५९॥*
सूर्य जल को नष्ट करके ही स्वाद तथा रंग से अलग करते हैं, किन्तु हंस बिना नष्ट किये ही दूध से जल को अलग कर देते हैं । अतः अलग करने की क्रिया रूप रचना हंस की ही श्रेष्ठ मानी जायगी वैसे ही काल शरीर को नष्ट करके धनादि से अलग करता है किन्तु गुरु शरीर के रहते ही उपदेश के द्वारा, धनादि से अलग कर देते हैं, अतः गुरु का कार्य श्रेष्ठ है।
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*संसार सार१ में विभूति वह्नि, मनसा अग्नि मिलाप ।*
*शीत रूप ह्वै सद्गुरु काढे, मिश्रित मुक्त सुताप ॥६०॥*
जैसे लोहे१ में प्रथम अग्नि होता है किन्तु बाहर का अग्नि मिलता है तब वह तपता है, फिर बाहर का अग्नि शांत होने पर लोहा शीतल हो जाता है, वैसे ही संसार में ऐश्वर्य रूप अग्नि तो प्रथम ही है किन्तु मन से उत्पन्न चिन्तादि रूप अग्नि उनसे मिलता है तब सांसारिक प्राणी संतप्त होते हैं, फिर सद्गुरु अपने उपदेश से चिन्तादि रूप को उनके मन से निकाल लेते हैं तब पुन: सांसारिक प्राणी उस संताप से मुक्त हो जाते हैं ।
(क्रमशः)