卐 सत्यराम सा 卐
**श्री दादू अनुभव वाणी** टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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**= लै का अँग ७ =**
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*लय*
सुरति सदा साबित रहे, तिनके मोटे भाग ।
दादू पीवैं राम रस, रहें निरँजन लाग ॥२८॥
जिनकी वृत्ति अखँड ब्रह्माकार रहती है और जो निरंजन राम के स्वरूप में अभेद भाव से लगकर ब्रह्मानन्द - रस का पान करते हैं, वे ज्ञानी सँत ही बड़भागी हैं ।
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*सूक्ष्म सौंज*
दादू सेवा सुरति सौं, प्रेम प्रीति सौं लाइ ।
जहं अविनाशी देव है, तहं सुरति बिना को जाइ ॥२९॥
२९ में ब्रह्म को प्राप्त करने की सूक्ष्म सामग्री बता रहे हैं - साधक ! अविनाशी ब्रह्म की सेवा प्रेमपूर्वक वृत्ति से ही होती है । अत: प्रीति से वृत्ति उनमें लगा । जिस निर्विकल्प समाधि अवस्था में अविनाशी देव ब्रह्म की प्राप्ति होती है उसमें ब्रह्माकार वृत्ति बिना कोई भी बहिर्मुख प्राणी नहीं जा सकता । अत: ब्रह्माकार वृत्ति रूप लय योग ही ब्रह्म प्राप्ति का मुख्य साधन है ।
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*विनती*
दादू ज्यों वै बरत१ गगन तैं टूटे, कहां धरणि कहं ठाम ।
लागी सुरति अँग तै छूटे, सो कत जीवे राम ॥३०॥
३० में अखँड ब्रह्माकार वृत्ति रहने के लिए विनय कर रहे हैं - जैसे बहुत ऊंचे आकाश में रस्से१ पर नृत्य करते हुए नट की वृत्ति रस्से से अलग हो जाय तो कहां उसको पृथ्वी और कहां अपना रस्सा रूप स्थान, रस्सा हाथ नहीं आ सकता और पृथ्वी पर पड़ने से जीवित नहीं रह सकता; वैसे ही हे राम ! साधक की वृत्ति आप में लगी हुई आपके स्वरूप से अलग होकर सँसार में चली जाय तो उसको नित्य जीवन रूप आपका अद्वैत स्वरूप कहां और सँसार में नित्य जीवन कहां ? वह तो बारँबार मृत्यु का दु:ख ही अनुभव करेगा । अत: हमारी वृत्ति आप से अलग न हो, ऐसी कृपा करिये ।
(क्रमशः)

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