रविवार, 26 फ़रवरी 2017

= १०० =

卐 सत्यराम सा 卐
दादू साधु शब्द सौं मिलि रहै, मन राखै बिलमाइ ।
साधु शब्द बिन क्यों रहै, तब ही बीखर जाइ ॥ ७० ॥ 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! इस मन को सतगुरु और सतपुरुषों के शब्दों में लगाओ । उनके विचार में तल्लीन करो । हे मुमुक्षुओं ! गुरु उपदेश और संत उपदेश के विचार बिना कोटि उपाय करने से भी मन स्थिर नहीं होगा और संसार की ओर ही दौड़ता रहेगा ॥ ७० ॥ 

शाह पुत्र मदन बस नारी, नग परखत अवस्था गुजारी । 
यूँ जो साध शब्द मन लावै, पति परमेश्‍वर सहजैं पावै ॥ 
दृष्टान्त १ : एक जौहरी का लड़का था । उसकी स्त्री पतिव्रता थी । स्त्री बोली ~ आप विदेश जाते हो । आपके बिना मैं किस प्रकार रहूँगी ? आपके बिना मेरा मन कैसे लगेगा ? जौहरी के लड़के ने दो आंदले जवाहरात के भर कर उसको दे दिये । इन नगों की परीक्षा में तुम अपने मन को लगाये रखना । कुछ समय के बाद में आ ही जाऊँगा । दार्ष्टान्त में, साधक को गुरुदेव ने उपदेश किया कि शास्त्रों के शब्दों में, संतों की वाणी रूप शब्दों में, अपने मन को लगाओ । इस प्रकार तुम सहज में ही पति परमेश्‍वर को प्राप्त कर लोगे ।

संत ग्राम बाहर रहै, कथा श्रवण को जाइ । 
संत शब्द लिख ठीकरी, मन बिलमावे आइ ॥ 
दृष्टान्त २ : एक सन्त ग्राम के बाहर रहते थे और एक सन्त गाँव के अन्दर रहते थे । गाँव वाले सन्त प्रतिदिन भक्तों को कथा सुनाया करते थे । कथा सुनने गाँव के बाहर रहने वाले सन्त भी आया करते थे और कथा के सुने हुए अंशों को अपनी कुटिया में आकर ठीकरियों पर लिख लिया करते थे और इन लिखे हुए सन्तों के शब्दों से अपने मन को भगवान् में लगाया करते थे जिससे उनका मन भक्ति में एकाग्र रहता था, इधर - उधर नहीं जाता था ।
(श्री दादूवाणी ~ मन का अंग)
(चित्र सौजन्य ~ नरसिँह जायसवाल)

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