卐 सत्यराम सा 卐
**श्री दादू अनुभव वाणी** टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
.
**= लै का अँग ७ =**
.
*सूक्ष्म सौंज अर्चा बँदगी*
दादू अंतर गत ल्यौ लाइ रहु, सदा सुरति सौं गाइ ।
यहु मन नाचे मगन ह्वै, भावै ताल बजाइ ॥२२॥
२२ - २३ में अर्चना भक्ति की सूक्ष्म सामग्री बता रहे हैं - साधक ! भीतर हृदय में स्थित परब्रह्म में ही वृत्ति लगा कर, सदा वृत्ति द्वारा उसी के गुण - गाता रह और यह तेरा मन भाव - रूप ताल बजाता हुआ प्रभु - सेवा में निमग्न होकर प्रभु के आगे नाचता रहना चाहिए, यही आन्तर भक्ति की सामग्री है ।
.
दादू पावे सुरति सौं, वाणी बाजे ताल ।
यहु मन नाचे प्रेम सौं, आगे दीनदयाल ॥२३॥
यदि कोई भक्त उक्त प्रकार से आन्तर अनाहत वाणी रूप ताल बजाता हुआ सुरति से प्रभु के गुण और आरती गाता है तथा उसका यह अन्तर्मुख मन प्रेमपूर्वक चिन्तन रूप नृत्य करता है, तो उसके आगे दीनदयालु भगवान् प्रकट होकर उसे दर्शन देते हैं ।
.
*विरक्तता*
दादू सब बातन की एक है, दुनिया तैं दिल दूर ।
सांई सेती संग कर, सहज सुरति लै पूर ॥२४॥
२४ में जीवन की अल्पता पर दृष्टि रखते हुये वैराग्य पूर्वक वृत्ति ब्रह्म में लगाने की प्रेरणा कर रहे हैं - सँपूर्ण कथा - वार्ताओं की सार रूप यह एक ही बात है - सँसार से मन को हटा कर नाम - चिन्तन द्वारा भगवान् को साथ करके लययोग द्वारा भगवत् के सहज स्वरूप में वृत्ति लगा कर उससे अभेद हो जाय । अकबर बादशाह ने प्रश्न किया था - सार साधन क्या है ? उसी का उत्तर इसी साखी से दिया था ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें