卐 सत्यराम सा 卐
दादू भँवर कँवल रस बेधिया, सुख सरवर रस पीव ।
तहँ हंसा मोती चुणै, पीव देखै सुख जीव ॥
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साभार ~ Girdhari Agarwal
**आध्यात्मिक शिक्षाप्रद कथा**
**देवर्षि नारद की संगीत-साधना**
कौशिक के स्वागत-समारोह में नारद जी को जो लक्ष्मी-नारायण के समीप से दूर हटाया गया था और उनकी जगह तुम्बुरु को बैठाया गया था, वह नारद जी को बहुत ही खला । वे समझ गए कि मेरा इतना बड़ा अध्ययन, इतनी बड़ी तपस्या आदि सब कुछ संगीत के सामने तुच्छ-सा हो गया । इस पर वे भी संगीत के ज्ञान के लिए उत्सुक हो गए और घोर तप करने लगे ।
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हज़ारों वर्ष बीतने पर आकाशवाणी हुई - ‘नारद ! यदि तुम गान जानना चाहते हो तो मानसरोवर के उत्तरी शैल पर चले जाओ, वहाँ गानबंधु नामक उलूक रहते हैं, उनसे सीखकर संगीत के जानकार हो जाओगे ।’
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देवर्षि नारद अविलंब मानसरोवर के उत्तर शैल पर जा पहुँचे । वहाँ देवर्षि ने देखा की गानबंधु बीच में बैठे हैं और उन्हें चारों ओर से घेरकर गंधर्व, किन्नर, अप्सराएँ और यक्ष बैठे हुए हैं । ये सब-के-सब गानबंधु से सीखकर गान विद्या में पारंगत हो चुके थे और आनंद की लहरों में डूब-उतर रहे थे ।
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देवर्षि नारद को अपने पास आया देखकर गानबंधु ने उठकर नमस्कार किया । जब गानबन्धु ने जाना की देवर्षि नारद मुझसे संगीत सीखना चाहते है, तब उन्हें बहुत ही प्रसन्ता हुई । देवर्षि नारद ने एक हज़ार दिव्य वर्ष तक संगीत की साधना की । संगीत सीख लेने पर देवर्षि नारद ने गानबंधु को गुरुदक्षिणा देनी चाही । गानबंधु ने कहा - ‘मैं चाहता हूँ कि संगीत द्वारा लंबी अवधि तक भगवान् की सेवा करता रहा हूँ । इसलिए आवश्यक है कि मेरी आयु लंबी और स्वास्थ्य सुदृढ़ हो ।’ देवर्षि ने उनकी आयु एक कल्प की कर दी और स्वास्थ्य भी सुदृढ़ कर दिया । साथ ही यह भी वरदान दिया कि ‘अगले कल्प में आप गरुड़ होंगे ।’
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देवर्षि नारद संगीत सीखकर भगवान् के पास पहुँचे । भगवान् ने उनका गान सुनकर कहा - ‘अभी तुम तुम्बुरु के समकक्ष नहीं हुए हो । कृष्णावतार मैं तुम्हें सर्वोच्च ज्ञान से सम्पन्न कर दूँगा ।’
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देवर्षि नारद वीणा पर भगवान् का गुणानुवाद गाते करते हुए तीनों लोकों में विचरने लगे । उनके आनंद की सीमा नही रही । कृष्णावतार होने पर ये भगवान् के पास पहुँचे । भगवान् ने उन्हें संगीत सीखने के लिए जाम्बवती के पास भेज दिया । रानी जाम्बवती ने एक वर्ष तक देवर्षि को संगीत की शिक्षा दी । दूसरी बार भगवान् ने देवर्षि को सत्यभामा के पास भेजा । एक वर्ष बीतने के बाद देवर्षि को महारानी रुकमणी के अनुशासन में रखा । महारानी रुकमणी ने उन्हें तीन वर्षों तक सिखाया । तत्पश्चात् भगवान् ने स्वयं देवर्षि को संगीत सिखलाया । इसके बाद भगवान् ने देवर्षि से कहा कि ‘अब आप तुम्बुरु से आगे बढ़ गए है ।’ इस तरह बहुत दिनों के बाद देवर्षि नारद की संगीत-साधना पूरी हुई ।

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