卐 सत्यराम सा 卐
दादू मनसा वाचा कर्मना, हरि जी सौं हित होइ ।
साहिब सन्मुख संग है, आदि निरंजन सोइ ॥
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साभार ~ Rajnish Gupta
**((((((( अमृतमय दिव्य आंवला )))))))**
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एक कल्प की बात है. समस्त संसार समुद्र में समा गया. अपने द्वारा रचित सृष्टि के विनाश हो जाने से ब्रह्मा जी दुखी थी. उन्होंने सृष्टि की पुनः रचना करने का विचार किया किंतु कहां से आरंभ करें इस उधेड़बुन में थे. उन्हें कोई राह दिखाई नहीं पड़ रही थी.
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जब कुछ समझ न आया तो सहायता और मार्गदर्शन के लिए ब्रह्मदेव ने श्री विष्णु जी का ध्यान किया. वह नारायण मंत्र ‘ऊं नमो नारायणाय’ का जप करने लगे. ब्रह्मा जी के आह्वान पर भगवान विष्णु ने उन्हें दर्शन दिया और इस कठिन तप का कारण पूछा.
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ब्रह्मा जी ने कहा- हे जगतगुरु ! सुंदर सृष्टि समाप्त हो चुकी है. पुन: सृष्टि का आरम्भ जरूरी है. इसकी रचना आपकी सहायता के बिना न हो सकेगी. मैं सहायता की याचना से ही आपका स्मरण कर रहा था. आप मार्ग दिखाएं.
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यह सुनकर विष्णु जी ने कहा-ब्रह्मदेव ! आप यह पावन कार्य फिर से शुरू करें. आप इसमें अवश्य सफल होंगे. इस कार्य में आपको बहुत से विघ्न आएंगे. आपके समस्त विघ्नों को मैं सहूंगा. आप तो रचना कार्य में ध्यान दें. अन्य चिंताएं मुझे सौंप दीजिए.
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भगवान विष्णु द्वारा ऐसे वचन सुनकर ब्रह्मा जी भाव विभोर हो गए. उनकी आंखों से भक्ति और प्रेमवश आंसू बह कर बह आए जो अनायास ही नारायण के चरणों पर गिरे.
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ब्रह्मदेव के नयन अमृत और विष्णु जी के चरण अमृत दोनों के दिव्य संयोग से वे आंसू तत्काल वृक्ष में बदल गए. वह वृक्ष भी अमृतमय हो गया. नारायण ने उस उत्तम वृक्ष को धात्री(जन्म के बाद पालन करने वाली दूसरी मां) नाम दिया.
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श्रीहरि ने ब्रह्मा जी को वरदान दिया- हे ब्रह्मदेव सृष्टि के सृजन के कार्य में यह धात्री वृक्ष(आंवला का वृक्ष) आप की बड़ी सहायता करेगा. इसके फल का नियमित सेवन करने वाले जीव वात, पित्त एवं कफ जन्य त्रिदोषों से मुक्त होकर स्वस्थ रहेंगे.
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कार्तिक नवमी को जो भी जीव धात्री वृक्ष का पूजन करेगा, उसे विष्णु लोक प्राप्त होगा. धात्री की महिमा अक्षय रखने के लिए श्री विष्णु देव अक्षय नवमी से तीन दिनों तक इस वृक्ष में निवास करते हैं और अमृत वर्षा करते हैं.
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उसी दिन यानी अक्षय नवमी से द्वापर का आरंभ माना जाता है. अक्षय नवमी को भगवान विष्णु ने कुष्माण्डक दैत्य का वध किया था. अक्षय नवमी को ही भगवान श्री कृष्ण ने कंस-वध से पहले तीन वन की परिक्रमा की थी. इसीलिए अक्षय नवमी पर मथुरा वृन्दावन की परिक्रमा की जाती है.
(स्कंद पुराण की कथा)
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(((((((((( जय जय श्री राधे ))))))))))
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