॥ दादूराम सत्यराम ॥
**श्री दादू चरितामृत(भाग-२)**
लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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**= विन्दु ९३ =**
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**= भोजराज का चित्र लोप संबन्धी प्रश्न =**
चित्राम मिटने की बात सुनकर भोजराज आये और दादूजी महाराज को प्रणाम करके पूछा - भगवन् ! चित्राम कैसे मिट गये? हमने तो बहुत अच्छे चित्रकारों को बुलवाकर वे चित्र बनवाये थे । उनके बनाने में समय भी बहुत लगा था तथा पैसा भी बहुत लगा था किन्तु बड़ी विचित्र बात है मिटाने वाले ने इतने शीघ्र कैसे मिटा दिये कि उसको कोई देख भी नहीं सका । कैसे मिटाये और किससे मिटाये कुछ भी ज्ञात नहीं हो रहा है तथा मिटाने के चिन्ह भी नहीं दीख पड़ते हैं । दीवारें साफ़ दीख रही हैं, मानौ तो ऐसी ही थी इन पर कोई चित्र थे ही नहीं । आपको कुछ ज्ञात हो तो कृपा करके बताइये । भोजराज की उक्त बात सुनकर दादूजी ने कहा -
**= दादूजी का उत्तर =**
वे चित्र भगवान् दर्शन में तथा भगवान् की भक्ति में बाधक थे । आने वाले लोग भगवान् के दर्शन रूचि पूर्वक नहीं कर पाते थे । उनका मन मनोरंजन रूप चित्रामों पर ही जाता था और अधिकतर लोग चित्रामों को ही देखते थे । मन्दिर तो उपासना गृह होता है, उसमें आकर तो भगवान् की भक्ति ही करना चाहिये । भक्ति की बाधक मनोरंजन की वस्तुयें उसमें नहीं होनी चाहिये । यहां कोई बैठकर भजन करता है तो चित्रों को देखने वाले कोलाहल करके उसके भजन में विघ्न करते हैं । इसलिये ये चित्र भगवान् को उचित ज्ञान नहीं हुये हैं । इसी से उन्होंने अपनी विचित्र शक्ति से दीवारों में ही लीन कर दिये हैं । कोई मनुष्य मिटाता तो उसे कोई देखता और उसके मिटाने के चिन्ह भी मिलते । भगवान् तो अपनी इच्छा मात्र से ही सब काम करते हैं अर्थात् जिस कार्य को करने की इच्छा करते हैं, वह इच्छा करते ही इच्छानुसार हो जाता है । अतः भगवान् की इच्छा उनको मिटाने की हो गई, इससे वे तत्काल ही मिट गये हैं । भगवान् की इच्छा के बिना कोई भी स्थिर नहीं रह सकता है फिर जड़ चित्र कैसे रह सकते थे । दादूजी महाराज के उक्त वचन सुनकर बुद्धिमान् भोजराज समझ गये कि - स्वामीजी महाराज तथा स्वामीजी महाराज के शिष्यों के भजन में विघ्न होने से संतों की इच्छा विघ्न मिटाने की अवश्य हुई होगी । उस संतों की इच्छा को पूर्ण करने के लिये ही भगवान् ने चित्र मिटा दिये हैं । भोजराज तो प्रणाम करके चला गया । फिर चौथे दिन ब्राह्ममुहूर्त्त में अंधेरे-अंधेरे ही दादूजी महाराज शिष्यों सहित त्रिपोलिया पर पधार गये ।
(क्रमशः)

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