परमगुरु ब्रह्मर्षि श्री दादूदयाल जी महाराज की अनुभव वाणी

शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

= विन्दु (२)९३ =


॥ दादूराम सत्यराम ॥
**श्री दादू चरितामृत(भाग-२)** 
लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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**= विन्दु ९३ =**
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**= त्रिपोलिया पर विराजना =** 
त्रिपोलिया को उचित स्थान देखकर वहाँ ही विराज गये । प्रातःकाल राजा नारायणसिंह और भाकरसिंह रघुनाथ मन्दिर में दादूजी के दर्शन करने आये किन्तु वहां कोई संत नहीं मिला, फिर उनको ज्ञात हुआ कि स्वामी दादूजी महाराज तो शिष्यों के सहित त्रिपोलिया पर विराजकर ब्रह्म - भजन कर रहे हैं । तब दोनों सज्जन त्रिपोलिया पर गये । वहां सब सन्त भजन कर रहे थे । नारायणसिंह तथा भाकरसिंह दादूजी का दर्शन करके अति प्रसन्न हुये और सत्यराम बोल, प्रणाम करके सामने बैठ गये । फिर हाथ जोड़कर नारायणसिंह ने कहा - स्वामिन् ! आपको जहां भी अनुकूल हो वहां ही धाम बना दिया जायगा । आप कृपा करके सेवक को आज्ञा दें । बस, आपके आज्ञा देने की देर है, आज्ञा देते ही तो जहां तक होगा अति शीघ्र ही धाम बन जायगा । तब दादूजी महाराज ने कहा - तुम्हारा कथन तो सत्य है किन्तु हम को प्रभु की आज्ञा जहां की होगी वह स्थल प्रभु की आज्ञा होने पर हम तुमको बता देंगे । 

**= भाकरसिंह का प्रश्न =** 
फिर भाकरसिंह साखूण वालों ने दादूजी से पूछा - भगवन् ! साधु का लक्षण मुझे बताने की कृपा करें ? भाकरसिंह का उक्त प्रश्न सुनकर दादूजी ने यह पद बोला - 
**= सन्त लक्षण =** 
"सद्गति साधवा रे, सन्मुख सिरजन हार । 
भव जल आप तिरैं ते तारैं, प्राण उधारन हार ॥ टेक ॥ 
पूरण ब्रह्म राम रंग राते, निर्मल नाम आधार । 
सुख संतोष सदा सत संयम, मति गति वार न पार ॥ १ ॥ 
जुग जुग राते जुग जुग माते, जुग जुग संगति सार । 
जुग जुग मेला जुग जुग जीवन, जुग जुग ज्ञान विचार ॥ २ ॥ 
सकल शिरोमणि सब सुखदाता, दुर्लभ इहिं संसार । 
दादू हंस रहैं सुख सागर, आये पर उपकार ॥ ३ ॥ 
संतों के मन की गति ब्रह्म में ही होती है, वे भजन द्वारा परमात्मा के सन्मुख रहते हैं । संसार - सिन्धु के विषय - जल से स्वयं तैरते हैं और अन्यों को भी तारते हैं । वे सब प्रकार से सांसारिक प्राणियों का उद्धार करने वाले होते हैं । पूर्ण ब्रह्म की भक्ति के रंग में अनुरक्त रहते हुये उनके निर्मल नाम का ही आधार रखते हैं अर्थात् निरंतर नाम जपते रहते हैं । उन्हें संतोष और संयम द्वारा सदा सुख रहता है, उनकी बुद्धि अपार होती है । वे सदा प्रभु प्रेम में अनुरक्त रहते हुये मस्त रहते हैं । उनकी संगति सदा करने से विश्व के सार ब्रह्म का ज्ञान होता है । वे सदा प्रभु से मिले रहकर सबसे प्रेम करते हुये सदा सबके जीवन रूप बने रहते हैं । सबको सुख देने वाले, सर्व प्राणियों के शिरोमणि संत इस संसार में सहज नहीं मिलते हैं, वे संत हंस तो ब्रह्म रूप सुख - सागर में ही रहते हैं, संसार में तो परोपकारार्थ ही आये हैं । अपने प्रश्न का उत्तर सुनकर भाकरसिंह प्रसन्न हुये । 
(क्रमशः)

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