परमगुरु ब्रह्मर्षि श्री दादूदयाल जी महाराज की अनुभव वाणी

शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

= निष्कामी पतिव्रता का अंग =(८/२५-७)

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卐 सत्यराम सा 卐 
**श्री दादू अनुभव वाणी** टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
**= निष्कामी पतिव्रता का अँग ८ =** 
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निश्चल का निश्चल रहे, चँचल का चल जाइ ।
दादू चँचल छाड़ि सब, निश्चल सौं ल्यौ लाइ ॥ २५ ॥
२५ - २६ में पतिव्रत रखने की प्रेरणा कर रहे हैं - निश्चल ब्रह्म का भक्त जन्मादि से रहित निश्चल ब्रह्म को प्राप्त हो, निश्चल होकर ही रहता है । चँचल मायादि का भक्त जन्मादि रूप सँसार के मार्ग में चलता ही रहता है । अत: साधक को चाहिए - चँचल मायादि की उपासना को त्याग कर निश्चल ब्रह्म से ही वृत्ति लगावे ।
साहिब रहताँ सब रह्या, साहिब जाताँ जाइ ।
दादू साहिब राखिये, दूजा सहज स्वभाइ ॥ २६ ॥
परब्रह्म का पतिव्रत रूप अनन्य भक्ति रहने से अन्य योग, यज्ञ, व्रतादि तो उससे अनायास ही होते रहते हैं । परब्रह्म का पतिव्रत रूप अनन्य - भक्ति नहीं हो, तो योगादिक भी निष्काम - भाव से नहीं होते और सकाम - भाव से किये हुये योगादि सँसार के ही हेतु हैं । अत: अनन्य - भाव से परब्रह्म का ही चिन्तन हृदय में रखना चाहिए । दूसरे साधन तो फिर सहज स्वभाव ही होते रहते हैं ।
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मन चित मनसा पलक में, सांई दूर न होइ ।
निष्कामी निरखे सदा, दादू जीवन सोइ ॥ २७ ॥
ब्रह्म का ही मन से मनन, चित्त से चिन्तन और बुद्धि से विचार होता रहना चाहिए । जीवन में एक पलक में भी परब्रह्म का चिन्तन चित्त से दूर नहीं होना चाहिए । इस प्रकार निष्काम भाव से पतिव्रत रखने वाला भक्त भगवान् को सदा ही सर्व देश, काल और वस्तुओं में देखता रहता है । उसका जीवन वह परब्रह्म ही है वो उसका वह जीवन ही उत्तम जीवन है ।
(क्रमशः)

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