गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

= विन्दु (२)९३ =

॥ दादूराम सत्यराम ॥
**श्री दादू चरितामृत(भाग-२)** 
लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥

**= अथ विन्दु ९३ =**

**= परमात्मा द्वारा संसार छोड़ने का संकेत =** 
जब वि. सं. १६५९ लगा तब परमात्मा ने दादूजी को संकेत द्वारा सूचित किया कि - वि. सं. १६६० में तुमको संसार छोड़ना है । जब परमात्मा ने उक्त आज्ञा रूप वचन कहा तब स्वामी दादूजी ने प्रभु की आज्ञा को अपने मन में रखली अर्थात् मान ली और पीछे दादूजी महाराज ने यह साखी बोली - 
"ज्यों तुम भावे त्यों खुसी, हम राजी उस बात । 
दादू का दिल सिदक से, भावे दिन हो रात ॥" 
हे प्रभो ! जैसे आपको प्रिय होगा और जिस बात में आपकी प्रसन्नता होगी, हम तो उसी बात में प्रसन्न हैं । हमारा मन तो सदा आप सत्यस्वरूप में ही लगा है । चाहे रात हो या दिन हो, हम तो आपके स्वरूप चिन्तन को छोड़ते ही नहीं हैं । उक्त साखी के चौथे पाद में 'दिन हो' के स्थान में 'दिन को’ पाठ भी मिलता है । उक्त प्रकार दादूजी को जब अपने गमन की भविष्य बात ज्ञात हुई तब दादूजी ने भी विचार करके अपने भविष्य गमन को समझ लिया । फिर जो शिष्य पास में थे उन को भी दादूजी के भविष्य में गमन की बात कुछ संकेतों द्वारा ज्ञात हो गई किन्तु उन में ऐसा कोई भी नहीं था जो स्पष्ट रूप में दादूजी से कुछ पूछ सके । संकोच के मारे कोई भी नहीं पूछ सकता था । सब शिष्यों के मन में उस समय धाम बनाने की बात उत्पन्न हो रही थी । वे सोच रहे थे कि धाम बनाने से परामर्श होता रहेगा । तब अन्तर्यामी दादूजी ने उन के मन की बात जान ली और अपने हृदय में भी विचार किया । 

**= धाम निर्णय =** 
फिर धाम कहां बनवाया जाय यह निर्णय करने के लिये विचार पूर्वक खोज करने पर अंत में दादूजी महाराज ने निश्चय किया कि नारायणा ग्राम ही अच्छा रहेगा । नारायणा ग्राम के पास ही सुन्दर सरोवर भी है और बस्ती भी अच्छी है । वहां ही ग्राम बनाना श्रेष्ठ तहेगा । फिर दादूजी महाराज ने नारायण ग्राम में धाम बनाने की इच्छा की तब नारायणा नरेश नारायणसिंह दक्षिण देश के अमरावती नगर में थे । वहां उनका किसी प्रतिपक्षी के साथ युद्ध चल रहा था किन्तु विजय नहीं हो रही थी । विजय किस प्रकार होगी, यही चिन्ता करते करते वे निद्रा के वश हो गये थे । फिर उनको निद्रा में स्वप्न हुआ ।
(क्रमशः)

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