शनिवार, 11 फ़रवरी 2017

= ६९ =

卐 सत्यराम सा 卐

**करणी बिना कथनी**

करणी किरका को नहिं, कथनी अनंत अपार ।
दादू यों क्यों पाइये, रे मन मूढ गँवार ॥ १२४ ॥ 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! जिनमें परमेश्‍वर की प्राप्ति कराने वाले साधन तो एक कण - मात्र भी नहीं हैं और वचन चातुरी बहुत है, ऐसे ज्ञानी और पंडित अनेकों हैं । जो भगवान् के तो गुणानुवाद एवं ज्ञान उपदेश सुनाते हैं, परन्तु उनमें भक्ति और ज्ञान की भावना तो लेशमात्र भी नहीं है । मन के भ्रमाये हुए, मोह में अंधे, विषयों में आसक्ति वाले, वाचक पंडित आत्म - तत्त्व को नहीं पहचान पाते ॥ १२४ ॥ 
‘कबीर’ कथणी कथी तो क्या भया, करणी ना ठहराइ । 
कालबूत के कोट ज्यूं, देखत ही ढहि जाइ ॥ 
कहे सुने का होत है, ताहि न रीझे राम । 
कथणी रही अलाह दी, करणी सेती काम ॥ 
(श्री दादूवाणी ~ मन का अंग)
चित्र सौजन्य ~ नरसिँह जायसवाल

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