परमगुरु ब्रह्मर्षि श्री दादूदयाल जी महाराज की अनुभव वाणी

सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

= लै का अंग =(७/३१-३३)

卐 सत्यराम सा 卐 
**श्री दादू अनुभव वाणी** टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
**= लै का अँग ७ =** 
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*अध्यात्म* 
सहज योग सुख में रहे, दादू निर्गुण जाण । 
गँगा उलटी फेरि कर, जमुना माँहीं आण ॥३१॥ 
३१ में लय रूप अध्यात्म साधन की प्रेरणा कर रहे हैं - लय रूप सहज योग का साधक निर्गुण ब्रह्म को अपना आत्म स्वरूप जानकर ब्रह्मानन्द में निमग्न रहता है । अत: हे साधक ! सँसार में गमन करने वाली चँचल वृत्ति रूप गँगा को सँसार से लौटा कर आन्तर स्थित ब्रह्माकार वृत्ति रूप यमुना में मिला=अनात्माकार वृत्ति को हटाकर ब्रह्माकार वृत्ति की स्थिरता रूप लय योग कर ! 
*लय* 
परमातम सौं आतमा, ज्यों जल उदक समान । 
तन मन पाणी लौंण ज्यों, पावे पद निर्वाण ॥३२॥
३२ - ३६ में लय योग का परिचय दे रहे हैं - जैसे जल और उदक शब्द दो हैं किन्तु अर्थ दोनों का एक ही है, वैसे ही जीवात्मा और परमात्मा शब्द भेद होने पर भी वस्तुत: दोनों एक ही हैं । जो साधक तन को देहाध्यास से हटाकर और मन को सँकल्प शून्य करके जल में नमक के समान ब्रह्म में मिला देता है, वही काल कर्म के बाणाघात से रहित ब्रह्म पद को प्राप्त करता है । 
मन ही सौं मन सेविये, ज्योँ जल जल हि समाइ । 
आतम चेतन प्रेम रस, दादू रहु ल्यौ लाइ ॥३३॥ 
जैसे मित्र निज मन को अपने मित्र के मन के साथ मिलाता है - उसकी इच्छा के अनुसार ही सब व्यवहार करता है, वैसे ही साधक अपने मन से प्रभु के मन की सेवा करे=प्रभु - आज्ञानुसार ही अपना साधनादि व्यवहार करे और जैसे जल में जल मिल जाता है वैसे ही आत्मा को ब्रह्म चेतन से अभेद करके प्रेम - पूर्वक ब्रह्मानन्द - रस में ही वृत्ति लगा कर स्थिर रहे । 
(क्रमशः)

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